भोपाल, नवदुनिया प्रतिनिधि। हमारा देश 15 अगस्त 1947 को आजाद हो गया था, लेकिन भोपाल को आजादी दो साल बाद मिल सकी। भोपाल पर नवाब हमीदुल्ला खान का शासन था। जो भोपाल रियासत को देश में विलय कराने के बजाए पाकिस्तान में मिलाना चाहते थे। उनके राज में रियासत में तिरंगा फहराने पर भी प्रतिबंधित था। देश की आजादी के दिन पूरी रियासत में केवल जुमेराती का डाकघर केन्द्र का कार्यालय था। ऐसे में केवल एक इसी इमारत पर राष्ट्रध्वज फहराया गया था। भोपाल की जनता देश का अंग बनना चाहती थी, इसके चलते जोशीले युवाओं ने नवाब के खिलाफ विलीनीकरण आंदोलीन का बिगुल फूंक दिया। जनता को दो साल संघर्ष करना पड़ा, तब जाकर भोपाल रियासत का भारत में विलय हो पाया।

विलीनीकरण आंदोलन की शुरुआत करने वाले युवाओं में शामिल समाचार पत्र नई राहें के संपादक भाई रतन कुमार ने अपने लेखों से रियासत की जनता को देश और रियासत के हालातों के बारे में जागरुक किया। भाई रतन के घनिष्ठ मित्र डा. शंकर दयाल शर्मा सहित कई नौजवानों ने इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। स्वातंत्र्य आंदोलन स्मारक समिति के डाक्टर आलोक गुप्ता बताते हैं, नवाब ने विलीनकरण आंदोलन को कुचलने की कोशिश की, लेकिन युवाओं का जोश कम नहीं नहीं हुआ, राज्य में इतनी अधिक गिरफ्तारियां हुईं कि जेलें कम पड़ गई थीं। लगभग एक महीने तक हड़ताल रही। इसी आंदोलन की पृष्ठभूमि से निकले व्यक्तित्व डा. शंकर दयाल शर्मा आदि राजनीति के शीर्ष शिखर तक पहुंचे, वहीं भोपाल ने मध्यप्रदेश की राजधानी बनने का गौरव प्राप्त किया।

नवाब की जिद ने दूर की आजादी

जब देश को आजाद करने का फैसला किया गया, उस समय यह निर्णय भी लिया गया कि पूरे देश में से राजकीय शासन हटा लिया जाएगा, यानी राजा-रजवाड़ों के साथ भोपाल के नवाब भी बस नाम के नवाब रह जाते और भोपाल आजाद भारत का हिस्सा बनता। लेकिन नवाब हमीदुल्लाह इस विरोध में थे, उनकी जिद की वजह से आजाद होने पर भी भोपाल में भारत का राष्ट्रीय ध्वज नहीं फहराया गया। दो साल तक ऐसी ही स्थिति रही।

नवाब ने की थी देश से अलग होने की घोषणा

मार्च 1948 में नवाब हमीदुल्लाह ने भोपाल के स्वतंत्र रहने अर्थात देश से अलग रहने की घोषणा कर दी। मई 1948 में नवाब ने भोपाल सरकार का एक मंत्रिमंडल घोषित कर दिया। प्रधानमंत्री चतुरनारायण मालवीय बनाए गए। तब तक भोपाल में विलीनीकरण के लिए विद्रोह शुरू हो चुका था। इस बीच तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने नवाब के पास संदेश भेजा कि भोपाल को मध्य भारत का हिस्सा बनना ही होगा। 29 जनवरी 1949 को नवाब ने मंत्रिमंडल को बर्खास्त करते हुए सत्ता के सारे अधिकार अपने हाथ में ले लिए। इसके बाद विरोध-प्रदर्शन और तेज हो गया। तीन महीने जमकर आंदोलन हुए। जब नवाब हमीदुल्ला हर तरह से हार गए तो उन्होंने 30 अप्रैल 1949 को विलीनीकरण के पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए, जिसके बाद आखिरकार एक जून 1949 को भोपाल रियासत भारत का हिस्सा बन गई।

Posted By: Ravindra Soni

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