आनंद दुबे, भोपाल। राजधानी में पिछले दिनों एक कथित एसडीएम के वाहन चालक को पुलिस ने वर्दी के दुरुपयोग के आरोप में एक शादी समारोह के बाहर से धर लिया था। सूचना मिली थी कि शादी गार्डन की पार्किंग में खड़ी एक लग्जरी कार पर आगे बंफर पर एसडीएम की प्लेट लगी है। कार का चालक बेल्ट लेकर आसपास के लोगों को चमका रहा है। पुलिस को भी उसने अपना परिचय एसडीएम मैडम की कार के चालक के रूप में दिया। जांच में पता चला कि चालक तो पुलिस कर्मचारी नहीं है, मैडम भी एसडीएम नहीं हैं। पुलिस मैडम पर हाथ डाल पाती, तभी दो माननीयों ने दखल देकर पुलिस कार्रवाई की हवा निकाल दी। चालक को तो हवालात में पहुंचा दिया गया, लेकिन एसडीएम मैडम के नाम पर पुलिस ने चुप्पी साध ली। बताया गया कि मैडम ने अपने परिवार में भी सभी को पीएससी से चयनित होकर एसडीएम बन जाना बता रखा था।

दारोगा जी की बाजीगरी

राजधानी के एक उपनगर में थाने की कमान संभालने वाले दारोगा जी अपनी बाजीगरी के चलते अक्सर सुर्खियों में बने रहते हैं। वह अपनी नौकरी का अधिकतर समय शहर के विभिन्न थानों में गुजार चुके हैं। साहब ने यदि कोई अपराध पकड़ लिया, तो कामयाबी रस्सी का सांप बनाकर बताई जाती है। उधर अपराध होने पर फरियादी को केस दर्ज कराने के लिए काफी पापड़ बेलना पड़ते है। हाल ही में दो बदमाश एक महिला को गुमराह कर उससे सोने के कंगन, अंगूठियां, चेन लेकर चंपत हो गए। महिला फरियाद लेकर थाने पहुंची, तो घटना दूसरे थाने की बता कर उसे टरकाने की कोशिश की गई। इस बीच मामला इंटरनेट मीडिया पर वायरल होने लगा, तो पहले तो दारोगाजी ने अपनी सफाई देकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश शुरू कर दी। इसके बाद वक्त की नजाकत भांपकर आनन-फानन में एफआइआर दर्ज कर ली गई।

अफसरों से घिरे तो टीआइ माननीय से जुड़े

शहर के एक इंस्पेक्टर अपनी कारगुजारियों के कारण हमेशा अफसरों के निशाने पर बने रहते हैं। इस बार विवादित जमीनों के सौदों में उनकी दिलचस्पी की भनक शहर के सबसे आला अधिकारी को लग गई है। उस जमीन को लेकर पुलिस मुख्यालय भी उनसे जानकारी ले रहा है कि इस इंस्पेक्टर को काबू में रखे, अन्यथा वह उसे अपने तरीके से शहर से रूखसत कर देंगे। बात यह है कि इंस्पेक्टर साहब का मन उलझी हुई कीमती जमीन देखकर ललचने लगता है। वह मामला सुलझाने बीच में कूद जाते हैं, लेकिन इस बार जहां कूदे हैं, वह उनके ही विभाग के आला अधिकारी के करीबी का मामला निकला। पहले तो इंस्पेक्टर को पता नहीं था। जब पता चला तो वह अफसरों से जुड़ने के बजाय इस बार एक माननीय की शरण में पहुंच गए हैं। उनकी लाइन भी अपने रिश्तेदारी की तरफ से जोड़ी है। अब देखना यह है कि इंस्पेक्टर के चांद सितारे उनको बचाते हैं या फिर से शहर से विदा करवाते हैं।

बात नहीं करना हो तो घर भूल जाते हैं फोन

शहर के एक अधिकारी इन दिनों अपनी कार्यप्रणाली को लेकर चर्चा में बने हुए हैं। वह अपने फोन को चाहे जब घर पर छोड़ अपने कार्यालय आ जाते हैं। अधिकारी फोन लगाकर उनसे संपर्क बनाने के लिए परेशान रहते हैं। इसके बाद भी उनकी कार्यशैली में कोई बदलाव नहीं आया। यहां तक कि संवादहीनता को लेकर उनके उपायुक्त भी उन्हें एक-दो बार टोक चुके हैं, लेकिन साहब को कोई फर्क ही नहीं पड़ता है। सुना है कि अब साहब का राजधानी में मन नहीं लग रहा, वह तो सिर्फ चुनाव संपन्‍न होने का इंतजार कर रहे हैं। इसके बाद उनकी मंशा शहर से दूसरे जिले में रवानगी डालने की है। इसके लिए वह चुपचाप तैयारी भी कर रहे हैं। अंदर की खबर यह भी है कि साहब पहले जिस जिले में थे, वहां के एसपी को भी उन्हें कान फूंककर जगाना पड़ता था कि जाओ चोरों को पकड़ो।

Posted By: Ravindra Soni

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