अंजली राय, भोपाल। निहारने चला हूं मैं... हर कमरा, बरामदा...। यह किसी गाने के बोल नहीं हैं। यह तो दिल की आवाज है, जो बरकतउल्ला विश्वविद्यालय के कुलपति महोदय के दिल से निकल रही है। दरअसल, अभी हाल ही में वहां चार करोड़ के प्रशासनिक भवन का लोकार्पण हुआ है, जिसमें कुलपति व कुलसचिव के साथ ही अन्य अधिकारियों व कर्मचारियों के लिए आलीशान केबिन बनाया गया है। लेकिन कुलपति महोदय का कार्यकाल तो अगले माह ही खत्म होने वाला है। शायद इसी कसक में उनके दिल से ये आवाज निकल रही है। हालांकि उन्हें दुख इस बात का है कि वे किसी को दोष भी नहीं दे सकते। क्योंकि अगर वे आते ही इस काम में लग जाते तो भले ही कुछ दिन के लिए, लेकिन नए केबिन में बैठ जरूर जाते। खैर कोई बात नहीं...हो सकता है उन्हें इससे भी बेहतर केबिन मिल जाए और उनका रुतबा और बढ़ जाए।

खुशी नहीं, सिर्फ गम

कभी खुशी, कभी गम से तो आप सभी वाकिफ ही हैं। आज सुनिए न खुशी, सिर्फ गम की कहानी। इनमें स्कूल शिक्षा विभाग के कुछ ऐसे अधिकारी शामिल हैं, जिन्हें खुशियों के ढेर पर भी बिठा दो, तो भी ये गम को खोज ही निकालेंगे। तभी तो भोपाल के सरकारी स्कूल की छात्राएं श्रीहरिकोटा तक सैटेलाइट लांच करने पहुंच जाती हैं और इन्हें पता ही नहीं चलता। पता भी चले तो क्यों, इसमें गम जो नहीं था। जबकि यह मौका था इन छात्राओं का हौसला बढ़ाने का। अपने काम का ढिंढोरा पीटने का। इतनी खुशी की बात, जिसे पूरे देश को जानना था, उस बात को भोपाल के लोग ही ठीक से नहीं जान सके। खैर अब तो जो हो गया सो हो गया। अब डर इस बात का है कि कहीं इन छात्राओं के लौटने पर ये उनका स्वागत करना भी न भूल जाएं और बच्चियों को मायूस न होना पड़े।

महोदय की कृपा तो फायदा ही फायदा

राजधानी का हिंदी विश्वविद्यालय ऐसा भी है, जहां महोदय की कृपा बरसती है। अगर महोदय की कृपा है तो आप महीने में एक-दो दिन आइए और हस्ताक्षर करके चले जाइए। तनख्वाह आपके खाते में आती रहेगी। जिन पर कृपा नहीं है, उन्हें तो रोज आना होगा। नहीं आने पर क्या, देरी से आने पर भी पैसे कटेंगे। शिक्षण व्यवस्था की तो बात ही मत कीजिए...वो तो चल रहा है और चलता ही रहेगा। बात जिम्मेदारी की करें तो अगर आप कुलपति महोदय के चहेते हैं तो एक क्या दो-दो नौकरी कर सकते हैं। तभी तो 120 लोगों के स्टाफ में ज्यादातर मौज करते रहते हैं और बाकी पर दिन-रात काम लदा रहता है। यही नहीं...अभी और सुनिए, यहां जो नहीं आता है उसका वेतन भी हर साल बढ़ता है और जो रोज आता है, उसका तो वही बता पाएगा कि पिछली बार कब बढ़ा था।

फिर फिरने लगे दिन

अभी कुछ ही दिन पहले राजधानी के पत्रकारिता विश्वविद्यालय में एक महिला विभागाध्यक्ष की तूती बोलती थी। उनके सामने किसी की कुछ नहीं चलती थी। लोग उनसे बात करने में भी डरते थे। यहां तक कि वे विभाग की जानकारी कम, प्रशासनिक अधिकारियों की जानकारी ज्यादा रखती थीं। दरअसल इसके पीछे कारण था, कुलपति महोदय से उनकी अच्छी मित्रता, लेकिन कुलपति महोदय की रवानगी के साथ ही उनके दिन बदल गए। सारा दबदबा खत्म हो गया, लेकिन मैडम फिर पुराने जलवे में लौट रही हैं। ऐसे में चर्चा है कि कहीं फिर से उनके मित्र कोई अधिकारी बनकर तो नहीं आ रहे हैं। हालांकि पूर्व कुलपति भी विश्वविद्यालय के किसी समिति से जुड़े हुए हैं। तभी तो मैडम का स्र्तबा फिर से नजर आने लगा है। अब देखना यह है कि यह जलवा आगे कौन-कौन सा रूप दिखाता है। फिर से वे अपने पुराने रूप में लौट पाती हैं या नहीं।

Posted By: Ravindra Soni

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