Bhopal Art News: भोपाल (नवदुनिया रिपोर्टर)। महिला सशक्‍तीकरण पर केंद्रित वीरांगना नाट्य समारोह के तीसरे दिन काव्य नाटक लमझना की प्रस्तुति हुई। इसमें गोंड जनजाति की संस्कृति, संस्कार, रहन-सहन और लोकगीत और नृत्यों का मंचन किया गया। नाटक बताता है कि जनजातियों की विवाह परंपरा में स्त्रियों को वर चुनने की आजादी है। इसके तहत शादी करने का इच्छुक युवक अपनी होने वाली ससुराल में आकर कुछ वक्त बिताता है, जिसे लमझना कहा जाता है। युवा यदि ससुराल में उपयुक्त साबित होता है तो उसकी शादी होती है वरन अपने घर लौट आता है। यह नाटक जनजातियों के विस्थापन के दर्द को भी बताता है। जल, जमीन और जंगल पर आश्रित जनजातियां किस प्रकार शहरीकरण का शिकार होकर अपनी संस्कृति और संस्कारों से दूर हो रही हैं, यह दिखाने की कोशिश इस प्रस्तुति के माध्यम से की गई।

नाटक विवाह संस्कार 'लमझना" पर केंद्रित है, जिसमें जमोला के पिता बुध्रू को लमझना बनाकर घर लाते हैं और उसकी परीक्षा शुरू होती है। जमोला और बुध्रू एक दूसरे को पसंद करने लगते हैं पर ये बात जमोला के पिता को रास नहीं आती और वो बुध्रू को वापस लौटा देते हैं। तभी अचानक गांव में खबर फैलती है कि बुध्रू को शेर ने खा लिया है। परंतु असल में बुध्रू शेर को पछाड़ देता है और जमोला के पिता के दिल में जगह बना लेता है। छत्तीसगढ़ की पृष्ठभूमि पर इस नाटक का निर्देशन ज्योति दुबे ने किया, जबकि नृत्य संयोजन आग्नेश्ा केरकेट्टा का था।

मंच पर कलकार: आशीष यादव, लोकेंद्र प्रताप सिंह, लता सांगड़े, जैकी, अभ्ािनेंद्र भावसार, काश्ािफ खान, नितीन प्रेमनाथ,कुसुम शास्त्री, विभा परमार,हिना मंसूरी, प्रियेश पाल।

Posted By: Lalit Katariya

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