Bhopal Art News: भोपाल (नवदुनिया रिपोर्टर)। इंसानियत, जाति-धर्म से बहुत ऊपर है। किसी भी जाति या धर्म का बनने से पहले हमें एक अच्छा इंसान बनना होगा। शहीद भवन में शनिवार को नाटक 'मंटो की मोजेल" में यही दिखाया गया। मशहूर कहानीकार सआदत हसन मंटो द्वारा लिखित इस कहानी का नाट्य रूपांतरण प्रेरणा अग्रवाल ने किया। निर्देशन गोपाल दुबे का था। एक घंटे पांच मिनट के इस नाटक का यह तीसरा शो था।

नाटक की कहानी भारत-पाकिस्तान के विभाजन के बाद हुए दंगाें के बीच रची गई है। नाटक में दिखाया गया कि मोजेल एक खुले विचारों की लड़की है। वह मुंबई के एक फ्लैट में रहती है। उसकी मुलाकात त्रिलोचन सिंह से होती है। वह धार्मिक रूप से कट्टर सिख है। त्रिलोचन मोजेल से प्यार करने लगता है और उससे शादी करना चाहता है। इधर, मोजेल बंधना नहीं चाहती। वह शर्त रखती है कि यदि त्रिलोचन अपने केश कटवा ले तो वह शादी करने के लिए तैयार होगी। त्रिलोचन अपने बाल कटवा लेता है। दोनों पुणे जाकर शादी करने की योजना बनाते हैं। अगले दिन त्रिलोचन इंतजार करता रहता है पर मोजेल अपने एक दूसरे दोस्त के साथ उसकी मोटर से देवलाली चली जाती है।

जान देकर प्रेमियों को मिलाती है मोजेल: इधर त्रिलोचन ने फिर पगड़ी पहनना शुरू कर दिया है। कुछ समय बाद त्रिलोचन को कृपाल कौर से प्रेम हो जाता है। दोनों शादी की तैयारी कर रहे होते हैं। इतने में मुंबई में दंगे हो जाते हैं। मोजेल लौट आती है।

त्रिलोचन कहता है कि कृपाल मुस्लिम इलाके में रहती है। वहां वह सुरक्षित नहीं है, इसलिए मैं उसे घर लेकर आना चाहता हूं। मोजल कहती है कि तुम्हें पगड़ी उतार कर चलना होगा, वरना मारे जाओगे। वह नहीं मानता। दोनों कृपाल के घर पहुंचते हैं। वहां दंगाई पहुंच जाते हैं। मोजेल अपना चोगा (गाउन) कृपाल को पहना कर भगा देती है और खुद नग्न भीड़ के बीच जाती है। सबका ध्यान उसके शरीर पर होता है। इस बीच वह सीढ़ी से टकराकर गिरती है और मर जाती है। इस तरह वह खुद जान देकर दो प्यार करने वालों को मिला देती है।

Posted By: Ravindra Soni

NaiDunia Local
NaiDunia Local