भोपाल(नवदुनिया रिपोर्टर)। हम अपनी बेटियों से सिर्फ इतना ही क्यों चाहते हैं कि वह अपनी इज्जत बचाते हुए ब्याह कर दूसरे के घर चली जाएं? गर्भ में बेटियां अक्सर मां को यही ताना सुनते हुए जन्म लेती हैं कि हमें बेटा ही चाहिए... ऐसा क्यों? कुछ इस तरह के सवाल दर्शकों से करते हुए और बोझ के तानों से रंगकर्मी बनने की यात्रा को बयां करते नाटक 'मुझे अमृता चाहिए" का मंचन शुक्रवार को वीरांगना नाट्य समारोह के तहत शहीद भवन में किया गया। इस नाटक का लेखन योगेश त्रिपाठी ने किया है, जबकि निर्देशन खुशबू पांडे का रहा। एक घंटे 50 मिनट की यह प्रस्तुति बेटियों के प्रति हमारी सोच पर कई प्रश्न खड़े करती है।

बेहतरीन अदाकारा बनी बिटिया

नाटक एक महिला की कहानी बयां करता है जो बोझ के तानों से तंग आकर रंगकर्मी बनने की यात्रा तय करती है। इसके चलते मंच पर नाटक के अंदर भी नाटक की रिहर्सल और मंचन देखने को मिलता है। नाटक में सेट डिजाइनिंग से लेकर प्रॉप्स में कई नवाचार देखने को मिले। यह कहानी एक लड़की से शुरू होती है, जिसकी शादी नहीं हो रही है। घर में मां-बाप परेशान हैं। इसी बीच लड़की को एक थिएटर ग्रुप के साथ काम करने का मौका मिलता है। थिएटर करते-करते उसका आकर्षण रंगमंच की तरफ हो जाता है। वह रंगमंच से प्यार करना शुरू कर देती है। वहीं दूसरी तरफ उसके घरवाले थिएटर से परेशान हो जाते हैं। वह उसे रोकते भी हैं, लेकिन बाद में उसके पापा उसे नाटक करने की इजाजत दे देते हैं। नाटक करते-करते वह लड़की अपनी मेहनत के दम पर एक बेहतरीन अदाकारा बन जाती है और अपनी मंजिल को छू लेती है।

Posted By: Lalit Katariya

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