Bhopal Arts and Culture News: भोपाल (नवदुनिया रिपोर्टर)। मप्र शासन के संस्‍कृति विभाग की बहुविध कलानुशासनात्‍मक गतिविधियों पर एकाग्र 'गमक' श्रृंखला में शनिवार शाम को भोजपुरी साहित्य अकादमी की ओर से केएल पांडेय, लखनऊ द्वारा 'हिंदुस्तानी संगीत में ठुमरी एवं बदलते स्वरूप" विषय पर एकाग्र परिचर्चा एवं संजीव सिन्हा, जबलपुर द्वारा कजरी गायन की प्रस्तुति हुई। कार्यक्रम की शुरुआत में केएल पांडेय ने परिचर्चा में ठुमरी के बदलते स्वरूप, गायक एवं गायिका पर परिचर्चा के दौरान उनकी बारीकियों को साझा किया। उन्होंने गिरिजादेवी से लेकर अब तक ठुमरी में आए बदलावों के बारे में बताते हुए कहा कि हिंदी फिल्मी गीतों में ठुमरी का प्रयोग अत्यधिक सफल रहा। आज के दौर की गायिका श्रेया घोषाल ने भी कई ठुमरी गाई हैं, जो काफी पसंद की गईं।

दूसरी प्रस्तुति संजीव सिन्हा एवं साथियों द्वारा कजरी गायन की हुई, जिसमें उन्होंने कजरी- नाचन लागे मोर, पड़न लागे रिमझिम..., सखी बरसे झमा-झम पानी... झूला गीत- सुकुमारी सिया हो, दुलारी सिया हो, झूला धीरे से झुलाओ... एवं झूला गीत- झूला पड़ा कदम की डार... का गायन किया। प्रस्तुति में हारमोनियम पर स्वयं संजीव सिन्हा, ढोलक पर राम ब्राम्हणे, तबले पर ऋषभ भट्ट, गिटार पर अंशुमान नामदेव एवं मंजीरा पर प्रथम कुशवाहा ने संगत दी।

वाजिद अली शाह के समय हुई शुरुआत : नवदुनिया से चर्चा में डॉ. पांडेय ने बताया कि हिंदस्तानी संगीत की उपशास्त्रीय विधा ठुमरी मूलत: नृत्य संबद्ध गायन है। ठुमरी अर्थात ठुमक-ठुमक + री (सखी को संबोधन) है। इसका मुख्य लक्ष्य रस परियाक है। नृत्य के साथ ठुमरी पेश करने की कला की शुरुआत नवाब वाजिद अली शाह के समय हुई, जो स्वयं सिद्धहस्त नर्तक और गायक थे। उनके समय में प्रचलित हुई ठुमरी लखनवी अंदाज की बोल बांट की ठुमरी कही जाती थी। इसे खड़ी या पछाहीं ठुमरी भी कहा गया। ठमुरी भाव और रस से भरी हुई होती है।

गमक में आज : गमक श्रृंखला के अंतर्गत रविवार शाम सात बजे से जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी की ओर से सत्यमंगल मांगीलाल कुलश्रेष्ठ और साथी, आगर का कबीर गायन एवं सोनसाय बैगा और साथी, मंडला द्वारा बैगा जनजातीय नृत्य की प्रस्तुति होगी, जिसका प्रसारण विभाग के यूट्यूब चैनल और फेसबुक पेज पर लाइव किया जाएगा।

Posted By: Ravindra Soni

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