धनंजय प्रताप सिंह, भोपाल। हिंसा के विचार को अहिंसा और रामधुन से रोकने की सियासी कोशिशें राजधानी में खूब चर्चा में रहीं। भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा पर आरोप लगे कि वह जनता को हिंसा का रास्ता दिखा रहे हैं। इसके जवाब में कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य दिग्विजय सिंह ने रामधुन का आयोजन किया। उनकी रामधुन यात्रा शर्मा के आवास तक जानी थी, लेकिन टकराव टालने के लिए उन्हें रोक दिया गया क्योंकि शर्मा के आवास पर भी रामधुन के जवाब में रामधुन चल रही थी। मजे की बात है कि रामधुन गा रहे दोनों पक्षों ने महात्मा गांधी की उस रामधुन को याद ही नहीं किया, जिसे वह रोज गाया करते थे। इसकी जगह अपनी- अपनी पसंद की रामधुन गाई। जब लोगों ने इसे सुना तो चौंक गए कि ये 'रघुपति राघव राजाराम, सबको सन्मति दे भगवान" वाली गांधीजी की रामधुन नहीं है। सही है ना कि गांधी बन पाना हर किसी के लिए संभव नहीं।

तेज दौड़ के बाद सुस्ती का आलम

प्रदेश में पुलिस कमिश्नर प्रणाली एक बार फिर चर्चा में है। मजे की बात है कि इसे लागू करने की घोषणा से गृह मंत्री भी आमजन के साथ ही अवगत हुए। हालांकि, शुरुआती तेजी के बाद अब कवायद सुस्त पड़ गई है और ये व्यवस्था भी सवालों के घेरों में बनी हुई है। गृहमंत्री इस फैसले से दूर रहे, लेकिन अब खुद इसे गति दे रहे हैं। हालांकि, राजधानी में सूदखोरों से तंग आकर परिवार द्वारा आत्महत्या जैसे मामले इस प्रणाली पर सवाल उठाते हैं। पीड़ित परिवार पुलिस के पास पहुंचा था, जहां समझौता भी करा दिया गया था। कई जानकार पुलिस को न्याय के अधिकार मिलने से इसे लागू करने के पक्ष में नहीं हैं। वैसे अब फाइल दौड़ पड़ी है, तो अंजाम तक पहुंचने की संभावनाएं भी बढ़ गई हैं। देखिए, मप्र में पुलिस कमिश्नर प्रणाली का आगाज कब होता है।

नए आगे, पुराने पीछे

इसे समरसता का भाव कहकर बचा जा सकता है कि जिन्होंने भारतीय जनता पार्टी के लिए जीवन खपा दिया, वे प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में तीसरी पंक्ति में बैठे थे, तो नए नवेले कार्यकर्ता सबसे आगे की सीटों पर विराजमान। ये दृश्य भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक का है, जो उन दिग्गजों के मन मस्तिष्क से नहीं हट रहा, जिन्हें तीसरी और चौथी पंक्ति में बैठना पड़ा। इतना ही नहीं बैठक के विभिन्न् सत्रों में प्रमुख वक्ताओं के संबोधन के दौरान भी कार्यकर्ताओं की सुगबुगाहट वरिष्ठों को नागवार गुजरी। मुश्किल ये कि प्रमुख संबोधन के इंटरनेट मीडिया पर प्रसारण के दौरान भी प्रतिक्रियाएं सुनी गईं। कुछ कार्यकर्ताओं ने संबोधन को जिस हल्के अंदाज में लिया, वह अनुशासन के दावों पर सवाल खड़े कर रहे हैं। बैठक के दौरान विधायकों के क्रिया-कपालों पर वरिष्ठ पदाधिकारियों द्वारा की गई टिप्पणी भी चर्चा में है। कार्यसमिति की बैठक के बाद कई अनुभवी नेताओं ने पर्याप्त प्रशिक्षण की जरूरत बताई।

पायलट की मप्र में उड़ान

युवा चेहरे की कमी से जूझ रही कांग्रेस के लिए सचिन पायलट नई उम्मीद हो सकते हैं। चर्चा है कि सचिन को राष्ट्रीय महासचिव के साथ मध्य प्रदेश प्रभारी की भी जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। इससे गुर्जर वर्ग के बीच कांग्रेस की पैठ बढ़ेगी, वहीं ओबीसी चेहरे की कमी को पूरा किया जा सकेगा। मप्र कांग्रेस में राष्ट्रीय स्तर पर पहचान रखने वाले युवा चेहरे की कमी भी दूर हो जाएगी। पायलट की मप्र में उड़ान से राजस्थान में अशोक गहलोत जरूर राहत की सांस ले सकेंगे, लेकिन मप्र में जोर-आजमाइश कर रहे युवा चेहरों को भविष्य की चिंता जरूर सता रही है। चर्चा है कि कांग्रेस हाइकमान जल्द ही इस दिशा में फैसला लेगा, जिससे 2023 विधानसभा चुनाव की तैयारियों को अभी से गति दी जा सके। असफल विद्रोह के बाद से सचिन पायलट भी अपना दमखम दिखाने नए मैदान की तलाश में हैं।

Posted By: Ravindra Soni

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