भोपाल, नवदुनिया प्रतिनिधि। भोपाल के जंगल में पुराने बाघों का इलाका सिमटता जा रहा है। इनकी जगह युवा बाघ अपना दायरा बढ़ा रहे हैं। इनकी मौजूदगी केरवा, कलियासोत, मेंडोरा और वाल्मी के जंगल में देखी जा रही है। ये बाघिन टी-123 की संतान है। वर्तमान में बाघ टी-1233 वाल्मी के जंगल में मौजूद है, जिसकी उम्र चार वर्ष है। यह जंगल कभी बाघ टी-1 का ठिकाना था। ये नए बाघ जंगल से बाहर आबादी तक न आ जाए, इसको लेकर वन विभाग की चिंता बढ़ गई है। इनकी निगरानी करने के लिए अलग-अलग टीमें लगाई गई है।

इन नए बाघों का दखल बढ़ा

भोपाल के नजदीक पूर्व में बाघ टी-1 व बाघिन टी-2 का ही दखल था। इसके बाद बाघों का कुनबा लगातार बढ़ता गया। इन्हीं की संतान बाघिन टी-123 ने बीते छह वर्ष में चार शावकों को जन्म दिया है। ये चारों जंगल में मौजूद है। इनके अलावा रातापानी वन्यजीव अभयारण्य से बाघों का मूवमेंट बढ़ता जा रहा है।

ये हैं चुनौतियां

- जंगल की सीमा रहवासी इलाकों से लगी है। दोनों के बीच का क्षेत्र पूरी तरह बाउंड्रीवाल व तार फेंसिंग से कवर्ड नहीं है। बाघों के आबादी वाले इलाकों में दाखिल होने का खतरा है। पूर्व में बाघ शाहपुरा की आकाशगंगा कालोनी व स्वर्ण जयंती पार्क में दाखिल हो चुके हैं।

- इन क्षेत्रों में बाघ व सभी प्रकार के वन्यप्राणियों की निगरानी व उनके प्रवेश करने पर सतर्क करने जैसा तंत्र नहीं है, जो कि गंभीर चूक है। आने वाले समय में इसके परिणाम आम जनमानस को भुगतने पड़ सकते हैं।

- भोपाल के नजदीक जिस हिसाब से बाघ, तेंदुए, भालू जैसे हिंसक वन्यप्राणी बढ़ रहे हैं, उसके अनुरूप खतरा बढ़ता जा रहा है। कुछ माह पूर्व ही निशातपुरा क्षेत्र की द्रोणांचल कालोनी में एक वन्यप्राणी ने बच्चे पर हमला कर दिया था, उसकी मौत हो गई थी।

- 10 सितंबर को बैरसिया के कल्याणपुर गांव में सियार दाखिल हो गया था, जिसके द्वारा एक बच्चे पर हमला कर दिया गया था। जिसे बचाने दौड़े उसके पिता, मां व दादी को भी नुकसान पहुंचा था। इस तरह वन्यप्राणी ग्रामीण अंचलों में भी दाखिल हो रहे हैं। ऐसी घटनाएं बढ़ती जाएंगी। इससे निपटने के लिए भोपाल सामान्य वन मंडल के पास कोई इंतजाम नहीं है।

- भोपाल सामान्य वन मंडल के पास 250 मैदानी कर्मचारी ही है, जबकि वन क्षेत्र काफी बड़ा है। समरधा, नजीराबाद व बैरसिया जैसी तीन प्रमुख रेंज है। बढ़ती चुनौतियों के सामने अमला काफी कम है।

Posted By: Ravindra Soni

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