हरिचरण यादव, भोपाल। तेंदुए शहर की तरफ क्या आए, वन अफसरों पर मुसीबतों का पहाड़ टूट गया। अब तेंदुए तो चले गए, लेकिन मुसीबत है कि जाने का नाम ही नहीं ले रही है। जाएगी भी कैसे, मुसीबत जो चार पैर वाली ठहरी। बात भोपाल वन मंडल में तीन बकरों की खरीदी की है। इन्हें पिंजरे के अंदर रखने के लिए खरीदा था। पिंजरे तेंदुए को पकड़ने के लिए लगाए थे। तेंदुए, बकरे खाने के लिए पिंजरे में प्रवेश करते ही स्वत: फंस जाते हैं। ये बकरे तो खा कर लेते हैं लेकिन निकल नहीं पाते। तीन में से एक बकरा हलाल हो चुका है, लेकिन तेंदुआ बच निकला। अब बकरे का भुगतान पाने के लिए भटक रहा है, खरीदने वाले साहब कोरोना संक्रमित हो गए हैं। दूसरे के पास भुगतान करने के अधिकार नहीं है। मालिक चढ़ाई कर रहा है। उधर, खरीदे गए दो जिंदा बकरों की देखरेख सिरदर्द बनी हुई है।

हम तो डूबेंगे सनम...

होशियारी ऐसी कि खेल करने वालों ने मंत्री को भी उलझा दिया। मंत्री भी इतने सीधे कि जाल में फंस गए। फिर क्या कहने.. अब जो किरकिरी हो रही है, उस पर लोग अंदरखाने मजे ले रहे हैं। एक-दूसरे से बतिया रहे हैं कि देखा, मंत्री को भी नहीं छोड़ा। बात तेज-तर्रार लेकिन अंदर से भोले ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर की है। मंत्री के मातहतों ने मनमर्जी के पद पा लिए हैं। इसके लिए प्रतिनियुक्ति को आधार बनाया है। तीन धुरंधरों ने खेल कर दिया। सहमति तो दूर मंत्री को पता तक नहीं चलने दिया। जब बात कार्रवाई के मुहाने तक पहुंची तो मंत्री के एक चेहते को ऊंचे ओहदे पर पहुंचा दिया। अब क्या होना, मंत्री ही बुरे फंसे। साहब के गले मुसीबत ऐसे पड़ी कि छुड़ाए नहीं छूट रही है। हम तो डूबेंगे सनम, तुम्हें भी ले डूबेंगे वाला इरादा लेकर बैठे अधिकारी तमाशा देख रहे हैं।

पीक तो आ गया गुरू

देखो! कोरोना संक्रमण का पीक आ गया है, अरे नहीं। ठहरो, अभी नहीं। पीक तो आने वाला है, बस देखते जाओ। तुम्हें कुछ नहीं पता, दिल्ली-मुंबई में तो पीक आ चुका है। भोपाल में भी 1,000 से ऊपर मरीज मिल चुके हैं। छह हजार मरीजों में इतने हैं तो सोच लो पूरी आबादी की जांच हो तो कितने... मतलब समझो, पीक तो आ गया गुरू। संभलकर रहो, इसी में भलाई है। सब छोड़ो यार, ये बताओ इस बार कोरोना खतरनाक क्यों नहीं है। इसमें कोई चाल तो नहीं है। चाल लगे तुम्हें, हमें तो बस ये पता है कोरोना आगे और असर दिखाएगा। घर-दफ्तर से लेकर चौक-चौराहों तक यही चर्चा है। महामारी विशेषज्ञ व डाक्टरों को छोड़ दें तो ज्यादातर पीक आने का अपनी-अपनी समझ से अंदाजा लगा रहे हैं। इन्हीं में से कुछ ऐसे हैं जो मास्क को गले में और सावधानियों को हवा में लटकाए घूम रहे हैं।

वादा तेरा वादा...

पशुपालन मंत्री प्रेमसिंह पटेल कहते थे भोपाल दुग्ध संघ में गलत करने वालों को हटाकर रहूंगा, पर ऐसा नहीं हुआ। विभाग के अपर मुख्य सचिव के निर्देश वाले एक पत्र के सामने मंत्री का पत्र कमजोर पड़ गया। बात उस पत्र की है जिसमें वह एक अफसर को हटाने के साथ निलंबन की कार्रवाई के लिए लिखते हैं। निलंबन की बजाए तबादला होता है लेकिन अमल नहीं होता। होता भी कैसे.. मंत्री के पत्र की काट में एसीएस का पत्र जो आ गया था। किस्सा मंत्री की टेबल पर पहुंचा तो वह नरम पड़ गए। सूत्रों की मानें तो समझौते की पेशकश हुई। इसमें कितनी सच्चाई है यह तो टेबल जाने लेकिन बात वादा तेरा वादा....वाले गाने की इस लाइन पर सिमट गई। चर्चा है कि पहले कार्रवाई की हवा भरते हैं। बाद में रफादफा होता है। पत्र लीक होने के बाद अफसर व विभाग की छवि धूमिल होती है।

Posted By: Ravindra Soni

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