- डॉ. जीटी खेमचंदानी

भोपाल अब पहले से सुंदर नजर आता है। राजधानी की तरह लगातार विकास हो रहा है। पहले बैरागढ़ से लालघाटी शुरू होते ही जंगल हो जाता था। रायल मार्केट से पीरगेट की तरफ जाते ही सन्नाटा छा जाता था। न्यू मार्केट भी जंगल सा नजर आता था। एमपी नगर तो अस्तित्व में ही नहीं था। इन इलाकों को देखकर कहा जा सकता है कि भोपाल धीरे-धीरे देश का सुंदर शहर बन रहा है, लेकिन एक कमी नजर आती है। वह है आपसी आत्मीयता। पहले लोग रिश्ते निभाते थे। अब स्वार्थ भावना हावी हो गई है।

एक समय था जब मंगलवारा, बुधवारा, छावनी और पुराना भोपाल के बाकी स्थान पहचान थे। तब शायद नया भोपाल बना ही नहीं था। न ही कोई इसका जिक्र करता था। मुझे याद है जब एमपी नगर विकसित होना शुरू हुआ था तो पांच रुपये प्रति वर्गफीट के भाव से भूखंड मिल रहे थे। उस समय किसी ने नहीं सोचा था की एमपी नगर भोपाल का हृदय स्थल बन जाएगा। समय के साथ विकास हुआ है। नया भोपाल सही मायनों में नया नजर आता है। नए पार्क, नई सड़कें, शापिंग माल भोपाल की पहचान बन रहे हैं। कुछ समय में हमें मेट्रो ट्रेन भी चलती नजर आएगी। यह बड़ा बदलाव है।

सरकारी अस्पताल के नाम पर केवल हमीदिया अस्पताल ही अच्छा माना जाता था लेकिन वहां भी बड़ी बीमारियों का इलाज नहीं हो पाता था। निजी अस्पताल भी एक या दो ही थे, इन अस्पतालों में भी जांच की समुचित व्यवस्था नहीं थी। लोग दिल्ली, मुंबई और चेन्‍नई इलाज कराने जाते थे। अब स्वास्थ्य सेवाओं में बहुत सुधार हो गया है। बड़ी से बड़ी बीमारियों का इलाज यहां के अस्पतालों में होने लगा है। इसे बड़ी उपलब्धि कहा जा सकता है। दुख इस बात का होता है कि समय के साथ शहर तो सुंदर हो गया, पर आपसी सद्भाव और मेहमाननवाजी कम हो गई। पहले मेहमान आते थे तो खुशी होती थी। अब किसी न किसी बहाने से पूछा जाता है कि आपका रिजर्वेशन कौन सी ट्रेन में है। संस्कार और आपसी संबंध कम हो गए हैं। निज हित बढ़ना चिंता का विषय है।

मेरे मन की याद गली

बैरागढ़ में पहले प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र था। गरीबों का इलाज नहीं हो पाता था। मुझे केंद्र में सेवाएं देने का मौका मिला। इसी दौरान संत हिरदारामजी से भेंट हुई। संतजी हमेशा गरीबों के स्वास्थ्य के लिए चिंतित रहते थे। बात 1990 की है। उन्होंने पूछा बड़ा अस्पताल कैसे बन सकता है। मैंने कहा सिविल का दर्जा मिल जाए तो सुविधाएं अपने आप बढ़ेंगी। संतजी के आशीर्वाद से इसी साल सिविल अस्पताल खुल गया। मुझे अधीक्षक बनने का अवसर मिला। सरकारी रिकार्ड में दोनों अस्पताल थे। हमने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को गांधीनगर शिफ्ट कराया। इससे वहां के नागरिकों को भी स्वास्थ्य सेवाएं मिलनी लगीं। संतजी बेहद प्रसन्न हुए। जनता की इतनी चिंता करने वाले किसी संत को मैंने अभी तक नहीं देखा।

- पूर्व अधीक्षक, बैरागढ़ सिविल अस्‍पताल

Posted By: Ravindra Soni

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