-गौरीशंकर शर्मा 'गौरीश'

विकास की सीढ़ियों पर चढ़ समृद्धि के शिखर पर पहुंचने में मेरे शहर भोपाल ने जितना खोया, उससे अधिक पाया है। मेरा भोपाल मिली-जुली संस्कृति एवं सभ्यता की मिसाल है। जर्दा, गर्दा, पर्दा और... की बात यहां के बर्ररू कट भोपालियों के मुख से कही सुनी प्रसिद्ध है। अब गर्दा और पर्दा तो लगभग नदारद है, लेकिन जर्दा और पान की पीक के निशान कभी मिटाए नहीं जा सकते। राजधानी की शायद पहली बिल्डिंग एमएलए रेस्ट हाउस ही है। वल्लभ भवन और अन्य तो बाद की हैं। इनमें भोपालियत की निशानियां 'पीक" इनकी दीवारें व सीढ़ियां की सफाई को मुंह चिढ़ाती आज भी मिल जाएंगी। बेशक राजधानी बनने के बाद भोपाल नया बन गया, हां... नया भोपाल। सही सुना आपने।

डा. शंकरदयाल शर्मा की कोशिश और यहां की खाली बेशकीमती हरी-भरी जमीन ने अपना दमखम आखिर दिखा ही दिया और इसे राजधानी का तोहफा मिल गया। यह बात और है कि अब हमें हरियाली दिन-रात कोसती दिखती है। कांक्रीट के पहाड़ व जंगल ने हमारा चैन व सुकून अवश्य चुरा लिया है। गैस कांड के बाद तो सांस लेना मुश्किल हो गया। रही सही कसर कोरोना महामाई ने पूरी कर दी। राजधानी बनने पर शासकीय विभागों के ऊंचे-ऊंचे भवन बनना लाजमी थे, सो बने और बनते जा रहे हैं। हमारे राजनेताओं का सपना भोपाल को पेरिस-सा बनाना और पेरिस-सा देखना है। स्मार्ट सिटी, मेट्रो सिटी के लक्ष्य की पूर्ति होने को है। जब मैंने साहित्य के काव्यायन क्षेत्र में घुसपैठ का मन बनाया, तब मैं वाल्मिक-सा हो गया। मैंने अपने शहर भोपाल को तब जैसा देखा समझा, उसकी एक बानगी इन पक्तियों से व्यक्त करूंगा- तंग गली सड़क पर गंदगी का राज है, यह मेरा शहर है, मुझे इस पर नाज है...। आज शहर बहुत बदल चुका है। स्वच्छता भी है। समय के साथ चलते हुए विकास जरूरी है लेकिन पर्यावरण के लिए हरियाली कहीं ज्यादा जरूरी है। सरकार को इस ओर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है।

मेरे मन की याद की गली

ये उस समय की बात है, जब प्रजामंडल ने भोपाल विलीनीकरण आंदोलन के लिए विरोध स्वरूप एक रैली का आयोजन किया था। रैली में बाल और युवा शामिल हुए। उस समय मेरी उम्र दस वर्ष थी। डा. शंकरदयाल शर्मा, शिव दयाल, दिनेश राय, सतीश मेहता, रुकमणि राय, लीला राय, हरिनारायण घट्ट, मोहनी देवी, बालकृष्ण गुप्ता, शिवनारायण वैद्य, भाई रतनकुमार आदि के साथ भोपाल टाकीज रोड पर मैंने भी झंडा थाम रैली में भाग लिया था। रैली के दोनों ओर रस्सी की सुरक्षा थी। भोपाल विलीन होकर रहेगा... जैसे नारे उछाले जा रहे थे। इतने में पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया। लाठी की असह मार से बचने हेतु रस्सी को खोल मैं तो भाग आया। बाद में मेरे हम उम्र दोस्त भी भाग आए। शेष को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था।

- लेखक वरिष्‍ठ साहित्‍यकार हैं।

Posted By: Ravindra Soni

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