- सुरेंद्रनाथ सिंह

52 सालों में शहर को तेजी से आगे बढ़ते देखा है। विकास की दौड़ में जहां सड़कों का जाल बिछा तो फ्लायओवर भी बने। अफसोस होता है तो बस इस बात का जिन पहाड़ियों पर चढ़कर चढ़कर दूर तक शहर को निहार लेते थे, हरियाली के अलावा साफ-सुथरे तालाब नजर आते थे, उन पहाड़ियों को सीमेंट कांक्रीट के जंगल लील गए हैं, तो हरियाली विकास की भेंट चढ़ गई है। समय-समय पर शहर को पेरिस, लंदन की तरह सुंदर बनाने के जुमले सुनाई देते हैं। अरे भाई, शहर पहले से ही काफी खूबसूरत है। इसे भोपाल ही रहने दो। विकास भी जरूरी है, लेकिन इसमें शहर की सुंदरता बरकरार रहे, इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए।

मेरे पिता पुलिस की नौकरी में भर्ती होकर 1958 में भोपाल आ गए थे, लेकिन मैं बलिया (उत्तर प्रदेश) से 1970 में भोपाल आया। तब मेरी उम्र लगभग 10 वर्ष की थी। बाणगंगा के पास मेरा घर हुआ करता था। तब न्यू मार्केट में गुमठीनुमा दुकानें हुआ करती थीं। शहर में ट्रैफिक बहुत कम था। सड़कें भी अच्छी थीं। जब कभी पिकनिक मनाने की इच्छा होती थी, तो हम पुराने शहर के बाजारों में चले जाते थे। जहां आज खड़े रहने की जगह नहीं मिलती, वहां तब घंटों बैठकर बतिया लिया करते थे। पुराने शहर जाते थे तो सीढ़ी नुमा बने तीन तालाबों को देखने जरूर जाते थे। वर्तमान में एतिहासिक महत्व के तालाब अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुके हैं।

1980 में मोतीलाल विज्ञान महाविद्यालय (एमवीएम) में पढ़ाई के दौरान अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ गया। तब विनय सेंगर, शिवराजसिंह चौहान से संपर्क हुआ। छात्र राजनीति के साथ ही वह भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गया। पार्टी से टिकट मिलने पर मध्य विधानसभा से विधायक का चुनाव जीता तो भोपाल विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष भी रहा। समय के साथ शहर को तेजी से बढ़ते भी देखा, लेकिन कहीं न कहीं हरियाली विकास की भेंट चढ़ गई है। हरियाली की कमी हमेशा खलती है। जिम्मेदारों को चाहिए कि शहर का विकास करें, लेकिन इसके लिए शहर के प्रबुद्ध लोगों की राय भी ले लें। उदाहरण के तौर पर राजधानी में बीआरटीएस कारीडोर बनाया गया। आम ट्रैफिक का इसमें प्रवेश प्रतिबंधित रखा गया। अब कारीडोर के दोनों तरफ मेट्रो ट्रेन प्रोजेक्ट और फ्लायओवर आकार ले रहे हैं। जिसके चलते कारीडोर औचित्यहीन बनकर रह गया है। शहर की नैसर्गिक सुंदरता आज भी कहीं न कहीं कायम है। जरूरत है कि विकास के नाम पर इसकी अनदेखी न हो।

मेरे मन की याद गली

वर्तमान में बाणगंगा क्षेत्र को देखकर बरबस ही मेरे बचपन की यादें ताजा हो जाती है। बाणंगगा में कलकल बहता साफ पानी कभी भूल नहीं सकता। बचपन में साथियों के साथ हम श्यामला हिल्स की पहाड़ी पर चढ़कर जवाहर चौक के पास झरनेश्वर मंदिर तक चले जाते थे। झरने का पानी इतना साफ रहता था कि नहाने के बाद उसका पानी पी भी लेते थे। पहाड़ी के दूसरे छोर से चलते हुए हम लोग बड़े तालाब तक पहुंच जाते थे। वर्तमान में बाणगंगा सिर्फ गंदा नाला बनकर रह गई है। इससे दुख होता है। शहर के जल स्त्रोतों को स्वच्छ और अतिक्रमण से मुक्त रखते के लिए विशेष कार्ययोजना बनाई जाना चाहिए।

- भाजपा नेता व पूर्व विधायक

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