- आलोक चटर्जी

मेरा भोपाल आना-जाना 1977 से आरंभ हुआ था। तब हम जबलपुर की नाट्य संस्था विवेचना की ओर से नाटकों का प्रदर्शन करने भोपाल आते थे। भोपाल उन दिनों जबलपुर से छोटा शहर था। एक कस्बाई सुगंध आती थी, जब तांगे में बैठकर रेलवे स्टेशन से न्यू मार्केट आते थे। शहर शुरू से ही रंगमंचीय और साहित्यिक गतिविधियों का केंद्र था। राज्य नाट्य समारोह में 'एक तारे की आंख", 'अखाड़े के बाहर' नाटकों का मंचन हुआ था। इनका निर्देशन अलखनंदनजी ने किया था। इन्हीं के मंचन के दौरान बतौर कलाकार मुझे रवींद्र भवन देखने का भी मौका मिला था। वहां शो करने का मजा भी अलग ही था। दर्शक बड़े समझदार और प्रबुद्ध थे।

उन दिनों नईदुनिया में नाटक के विषय में विस्तार से रिपोर्ट आती थी। 1982 में रंगमंडल भारत भवन बना और मुझे रंगमंडल में चुन लिया गया। तब भोपाल में रंगायन, रंगशिविर, समांतर आदि संस्थाएं काम कर रहीं थीं। इन संस्थाओं में वरिष्ठ कलाकार थे। बाद में दर्पण भी बना। रंगमंडल ने बहुत जल्दी ही अपनी पहचान देश भर में बना ली और घासीराम कोतवाल, दो कश्तियों का सवार, इंसाफ का घेरा, स्कंदगुप्त, अंधा युग और आधे-अधूरे जैसे नाटक रंगमंडल ने वर्षों तक खेले। टिकट व्यवस्था की अनिवार्यत: लागू थी।

शनिवार और रविवार को सुबह और दोपहर के अलग शो होने शुरू हुए। ये नई रंग गतिविधियां थीं, जो भोपाल में पहली बार हो रहीं थीं। उन दिनों अधिकतर रंगकर्मी पैदल या साइकिल से आते थे। कुछ लोगों के पास मोटरसाइकिल या स्कूटर थी, लेकिन नाटक की रिहर्सल हमेशा समय पर होती थी। नाटकों का शो भी समय पर प्रारंभ होता था। भोपाल में आज अनेकों अनुदान प्राप्त संस्थाएं हैं, परंतु तब का रंगमंच कलाकारों के जुनून पर निर्भर था। तकनीकों का इस्तेमाल कम था, परंतु भाव का प्रभाव अधिक था। वरिष्ठों के सामने नये रंगकर्मी बहस नहीं करते थे। एक परस्पर आदर भाव सभी में था। आज भोपाल में बहुत रंगकर्म हो रहा है, बाहर के युवा भी यहां आ रहे हैं। शहर अब महानगरीय विस्तार पा रहा है। ऐसे में जाहिर है कि शहर की हरियाली पहले से कम हुई है। प्रदूषण बढ़ा है। अनियंत्रित ट्रैफिक भी एक समस्या है, लेकिन यह शहर कलाकारों के लिए एक आदर्श था, है और हमेशा रहेगा।

मेरे मन की याद गली

1982 से 1984 तक मैं लखेरापुरा में हकीम साहब के घर पर किराये से रहा। उन दिनों रात को गलियों में कैरम खेला जाता था और पटियाबाजी होती थी। जमीर होटल, मदीना और अग्रवाल होटल देर रात तक खुले रहते थे। यहां हम लोग रात के दो बजे खाना खाने या नाश्ता करने जाया करते थे। चौक में रात को चटोरी गली में खाना, रंगमहल पर चाय पीना और बस स्टैंड पर भजिया खाना हम कभी भूलते नहीं थे। पैदल ही निकल जाते थे। हबीबगंज रेलवे स्टेशन उन दिनों बनना शुरू हुआ था। तब सुना था कि रोशनपुरा से हबीबगंज जाने के लिए आटो से 10 रुपये लगते हैं। किराया ज्यादा था, इसलिए कभी जा नहीं पाए। कभी-कभी भटसूअर में बैठकर सिटी से पालिटेक्निक चौराहा तक आ जाते थे।

- लेखक वरिष्‍ठ रंगकर्मी हैं।

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