- घनश्‍याम सक्‍सेना

मैं 1956 में जब भोपाल आया, उस वक्त यहां कालोनियां बन रही थीं। मैं उस वक्त जहां रहता था और अभी भी जहां रहता हूं, वो थी प्रोफेसर कालोनी। मजे की बात यह है कि यहां कभी कोई प्रोफेसर नहीं रहा। दरअसल यहां पास में हमीदिया कालेज है, तो मुख्यमंत्री रहे डा. शंकर दयाल शर्मा ने यह सोचकर इन घरों को बनाया था कि यहां कालेज के प्रोफेसर रहेंगे, लेकिन फिर प्रदेश आपस में मिल गए, भोपाल राजधानी बन गया। तब बड़े-बड़े अफसर, सेक्रेटरी, विभागाध्यक्ष यहां आ गए। ऐसे में जब तक उन्हें कोई दूसरा घर नहीं मिला, वे यहीं रहे। तब से यही चलता आ रहा है।

भोपाल में रोचक बात यह है कि यहां कई कालोनियों के नाम नंबरों पर हैं, जैसे- 74 बंगले, 45 बंगले, 10 नंबर, 11 नंबर, 2 नंबर, 5 नंबर। बजाय कालोनियों को कोई नाम देने के, नंबर दे दिए गए। जिस क्षेत्र में जितने घर, उस कालोनी का नाम वही। उस क्षेत्र के बस स्टाप का जो नंबर, कालोनी का नाम भी वही हो गया। वैसे यहां सप्ताह के दिनों के ऊपर भी जगहों के नाम दिए गए हैं जैसे- सोमवारा, मंगलवारा, बुधवारा... क्योंकि उस क्षेत्र में इन दिनों पर हाट लगा करता था, तो वो नाम दे दिए।

भोपाल की जो बातें, उसे दूसरे शहरों से अलग करती हैं, वह है हरियाली और ढेर सारे सरकारी दफ्तर। लेकिन वर्तमान में दोनों को ही संभाला नहीं जा रहा। हरियाली लगातार कम हो रही है। मैं और मेरे जैसे लोग जिस-जिस कालोनी में रहे, वहां-वहां हमने आम, जामुन के पेड़ लगाए, उन्हें बड़ा किया, लेकिन विकास के नाम पर उन पेड़ों को चंद मिनटों में काट दिया गया। विदेशों का उदाहरण लें, वहां लोग घरों को इस तरह बनाते हैं कि पेड़ भी नहीं कटता और घर की खूबसूरती भी बनी रहती है। ऐसे उपाय हमें करने चाहिए। वहीं सरकारी दफ्तरों की सीढ़ियों को देखें तो आपको घिन आएगी। हर तरफ पान व गुटखा थूका हुआ दिखाई देता है।

यहां लोगों में जागरूकता की बहुत ज्यादा कमी है। कहीं भी कुछ भी फेंक देते हैं। कचरापेटी तलाशने, उसके पास जाने की मशक्कत नहीं करते। ये सोचने वाली बात है कि भोपाल राजधानी होने के बावजूद इंदौर जितना साफ-सुथरा नहीं है। स्वच्छता में नंबर एक नहीं बन पाया। इंदौर लगातार विकास कर रहा है। वहां बड़े-बड़े उद्योग हैं, नाइट लाइफ है, सराफा, छप्पन जैसी खाने-पीने की जगहें हैं, जो देर रात तक गुलजार रहती हैं और भोपाल में 10-11 बजे ही दुकानें बंद करा दी जाती हैं। पहले पटियों की परंपरा थी, तो रातों में गलियां गुलजार हुआ करती थीं। अब वो भी विकास के कारण नहीं बचीं। यही वजह है कि रात के वक्त भोपाल में घूमने-फिरने में लोगों को डर लगता है।

मेरे मन की याद गली

एक नवंबर 1956 को विंध्यप्रदेश सहित चार राज्यों को मिलाकर मध्य प्रदेश बना था। मैं इस दिन के ठीक दो दिन पहले यानी 29 अक्टूबर को विंध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शंभूनाथ शुक्ल के साथ भोपाल आया था, क्योंकि उन्हें यहां एक नवंबर को मंत्रीमंडल में शपथ लेनी थी। तब मैं उनका पीआरओ हुआ करता था। उस वक्त मेरी उम्र सिर्फ 23 साल थी। हम लोग गाड़ी से सड़क के रास्ते आ रहे थे। रात को कटनी में रुक गए। सुबह सागर, रायसेन से होते हुए आ रहे थे। रायसेन में एक मजार है, उसके थोड़ा पहले हमारी कार का टायर पंचर हो गया। 8-10 लोग वहां तुरंत आ गए। उन्होंने कहा कि जो भी यहां से निकलता है, वो मजार में जरूर रुकता है। आप शायद नहीं रुक रहे थे, इसलिए गाड़ी पंचर हो गई। भोपाल से जुड़ी यह पहली घटना थी, जिसे मैं कभी नहीं भूल सकता।

- लेखक वरिष्‍ठ साहित्‍यकार हैं

Posted By: Ravindra Soni

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