भोपाल (नवदुनिया प्रतिनिधि)। पश्चिम-मध्य रेलवे से चलने वाली छह ट्रेनों के रैक (कोचों का समूह) एक से दूसरी ट्रेनों में उपयोग किए जा सकेंगे। उपयोग करते समय इन कोचों में बदलाव करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। प्रत्येक ट्रेनों में 22 कोचों का एक रैक होगा। सभी रैकों में स्लीपर, फर्स्ट एसी, सेकंड एसी, थर्ड एसी कोचों की संख्या भी एक सामान ही होगी। अभी तक सभी ट्रेनों के रैकों में कोचों की संख्या अलग-अलग होती थी। साथ ही श्रेणीवार भी किसी में स्लीपर के सात कोच होते थे तो किसी में 12 कोच होते थे। इसी तरह वातानुकूलित कोचों की संख्या में भी बदलाव होता था। इस वजह से ट्रेनों के रैक एक-दूसरे में उपयोग नहीं किए जाते थे। दिक्कतें होती थी। यदि उपयोग करना भी होता था तो कोच कम्पोजिशन में बदलाव करने होते थे। जिसमें समय लगता था। जिस स्टेशन पर रैक में बदलाव करना होता था उस क्षेत्र में यार्ड की लाइनें व्यस्त होती थी। दूसरे ट्रेनें प्रभावित होती थीं।

बता दें कि इन सभी ट्रेनों में जर्करहित व बाहरी आवाज से निजात देने वाले आधुनिक कोच लगे हैं। इन ट्रेनों में भोपाल मंडल के हबीबगंज स्टेशन से चलने वाली भोपाल एक्सप्रेस भी शामिल है। इन ट्रेनों में जर्मन कंपनी लिंक हॉफमैन बुश (एलएचबी) के तकनीकी सहयोग से तैयार कोच लगाए गए हैं। ये तेज गति से चलने और दुर्घटना से बचाने में सक्षम है।

आधुनिक कोच लगाने के यह भी फायदे

- सेंट्रल बफर कपलिंग लगी होती हैं, इसलिए दुर्घटना होने पर कोच एक-दूसरे पर नहीं चढ़ते।

- ये 160 से 200 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ने में सक्षम होते हैं।

- कोच में एंटी टेलीस्कोपिक सिस्टम लगा होता है। इसके कारण ये पटरी से नहीं उतरते।

- कोच का साउंड लेवल 60 डेसिबल से भी कम होता है। ट्रेन के चलने से निकलने वाली आवाज यात्रियों तक कम पहुंचती है।

- 5 लाख किमी चलने पर मेंटेनेंस की जरूरत पड़ती है। सामान्य कोच का 2 से 4 लाख किमी चलने पर मेंटेनेंस करना पड़ता है।

- कोच के भीतर एयर कंडीशनिंग सिस्टम लगे होते हैं, जो तापमान को नियंत्रित करते हैं।

- इनकी बाहरी दीवारें सामान्य कोचों की तुलना में अधिक मजबूत होती हैं। लिहाजा, यदि हादसा होता भी है, तो यात्रियों के नुकसान की आशंका कम रहेगी।

- कोच की भीतरी डिजाइन में स्क्रू कम उपयोग हुए हैं। हादसों की स्थिति में यात्रियों को ज्यादा चोटें नहीं आती।

Posted By: Ravindra Soni

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