संदीप चंसौरिया, भोपाल। प्रदेश कांग्रेस में पिछले कुछ वर्षों से नाम और दाम का खेल खूब चल रहा है। नगर हो या प्रदेश सरकार, खरीद-फरोख्त का आमंत्रण सबसे पहले इन्हें ही आता है। इस बार तो इनकी नीलामी का आरोप नैतिक मूल्यों की हद भी पार कर गया। राष्ट्रपति चुनाव देश की गरिमा से जुड़ा है, इन्हें इसका भी भान नहीं रहा। मौका मिलते ही कर दी आरोपों की बौछार और कह दिया कि समर्थन के लिए उन्हें 50 लाख रुपये और मंत्री पद का प्रस्ताव मिला है। जब सबूत की बारी आई तो लगे बगलें झांकने। अब यह तो सोचने वाली बात है कि भला स्पष्ट बहुमत के बाद भी कोई इनकी बोली क्यों लगाने लगा। फिर भी कांग्रेस के उमंग सिंघार ने आफर का आरोप मढ़कर न सिर्फ अपने ही नेता को उलझन में डाल दिया, बल्कि यह भी जाहिर कर दिया कि उन्हें सुर्खियों के लिए दाग भी मंजूर हैं।

यहां संगठन ही सब कुछ है

भाजपा का मूलमंत्र ''संगठन" ही सर्वोपरि। नगर निगम चुनाव में एक बार फिर सिद्ध हुआ। महापौर पद के लिए अनुभवी, कुशल राजनीतिज्ञ कांग्रेस प्रत्याशी विभा पटेल को भाजपा ने अपनी इसी शक्ति के दम पर घर बैठा दिया। भाजपा ने 85 वार्डों में पार्षद प्रत्याशियों के साथ अपनी महापौर प्रत्याशी मालती राय को नगर सरकार के चेहरे के रूप में प्रस्तुत करके चुनाव लड़ा और मैदान मार लिया। कांग्रेस फिर गुटबाजी में उलझ गई। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष कमल नाथ ने भले ही पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को भोपाल की चुनावी कमान सौंपी, लेकिन मुकाबले में पार्टी का हर पार्षद प्रत्याशी सिर्फ अपने लिए लड़ा। प्रचार में एक तरह से कांग्रेस के महापौर प्रत्याशी का चेहरा अकेला ही किला लड़ाते दिखा। दिग्विजय सिंह मैदान में उतरे भी पर लोकसभा की तरह इस बार भी भाजपा की संगठित फौज के आगे जादू दिखाने में नाकामयाब हो गए।

खोदने वाले खोद रहे, डूबने वाले डूब रहे

शहर में मुरम, मिट्टी, पत्थर खोदकर माल कमाने वाले कमा कर चल दिए। मासूमों को डूबने के लिए जगह-जगह खंतियां छोड़ गए। खंतियों का भी क्या दोष, वर्षा होगी तो उन्हें लबालब होना ही है। आसपास रह रहे मेहनतकश परिवारों के बच्चों को भी नहीं मालूम कि मुहाने तक भरी खंतियां उनकी उुंचाई से कई गुना गहरी हैं। प्रशासन के आदेश स्पष्ट हैं कि खनन करने वाला खोदाई पूरी होने पर खदान को कटीले तार से घेरेगा। लापरवाही हुई तो थाने में रिपोर्ट लिखी जाएगी। आदेश का पालन कराने की जवाबदेही भी सौंपी गई है। कागजों पर आदेश के पालन व कार्रवाई का सिलसिला भी वर्षों से चल रहा है। खोदने वाले खोदते जा रहे हैं और जिम्मेदार आंख मूंदकर अनजान बने हुए हैं। थाने का रोजनामचा रिपोर्ट को तरस रहा है। डूबने वाले डूब रहे हैं और मरने वाले मरते जा रहे हैं। भला इससे बेहतर प्राकृतिक व्यवस्था और क्या होगी।

लेन-देन सब बराबर

प्रदेश में त्रि-स्तरीय पंचायत चुनाव निर्विघ्न संपन्न हो गए। समर्थितों के जीत-हार के दावे के साथ जश्न भी मना लिया गया। कहीं खुशी-कहीं गम का माहौल रहा, लेकिन प्रतिष्ठा वाले जिले छिंदवाड़ा व सीहोर में जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी राजनीति के भंवर में फंस गई है। आरक्षण और जीत-हार के आंकड़ों में दावे उलझ गए। भाजपा-कांग्रेस के दो दिग्गजों के गृह जिले होने के नाते इन पर समूचे प्रदेश की निगाहें भी थीं। छिंदवाड़ा में भगवा जमकर लहराया, लेकिन अध्यक्ष के लिए आरक्षित वर्ग से भाजपा के पास कोई सदस्य नहीं है। सीहोर में भाजपा-कांग्रेस दोनों के पास सात-सात सदस्य और अध्यक्ष की कुर्सी के लिए मजबूत दावेदार भी हैं पर कांग्रेस को यहां तटस्थ का सहारा भी है। ऐसे में दोनों जिलों में समय रहते राजनीति के चाणक्यों ने यहां ''लेन-देन सब बराबार" का रास्ता निकाल लिया है। इस फार्मूले से किला बचने के साथ काम भी हो जाएगा।

Posted By: Ravindra Soni

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