सीधी बात : आइएएस अधिकारी लोकेश जांगिड़ के असंतोष की खबरें सार्वजनिक हो गई हैं। ऐसे ही बागी सुर आइपीएस बिरादरी में लंबे समय से सुने जा रहे हैं। यूनिफार्म प्रोटोकॉल के तहत सार्वजनिक रूप से इस मामले में चुप्पी है, लेकिन व्यक्तिगत वाट्सएप ग्रुप में इस मामले में काफी कुछ लिखा और कहा जाता रहा है। जांगिड़ की वाट्सएप चैट की जानकारी सार्वजनिक होने पर पुलिस मुख्यालय में भी सफाई कार्य चला। ग्रुप एडमिन से मनुहार की गई कि अमुक तारीख में आओ और जो लिखा था, उसे हटा दो। अब चैटिंग में भी सतर्कता बरती जा रही है। किसी ने कुछ ऐसा लिखा, जिस पर आपत्ति हो सकती है, तो उसे हटाने की सलाह दी जा रही है। बात नहीं मानने वालों को सख्ती के साथ अनुशासन की सीख दी जा रही है। ग्रुप एडमिन प्रोटोकॉल के पालन को लेकर सभी सदस्यों के लिए नई गाइडलाइन तैयार कर रहे हैं।

वाह-वाह का चक्कर

पुलिस महकमे से जुड़े विभागों में साहित्यप्रेमी कम नहीं हैं। एक जांच एजेंसी में शायरी और कहानी की जुगलबंदी काम का तनाव कम कर रही है तो कहीं नई किताब के ताजा शब्दों पर सलाह ली जा रही है। यह स्पष्ट कर दें कि इस साहित्य सेवा से काम प्रभावित नहीं हो रहा है। ये लोग लंच ब्रेक या कार्यालयीन समय के बाद अपने इस शौक को पूरा कर रहे हैं। साहित्यिक विधा सुकून देती है, लेकिन उनका क्या जिन्हें बात जरा कम समझ आती है। बातों-बातों में कुछ लाइनें साहब ने कह दीं तो क्या बात कहना फर्ज हो जाता है। कुछ तो ऐसे भी थे, जिन्होंने केबिन से बाहर निकलकर साथी से इस भरोसे में मतलब पूछ लिया कि यह जानकार उनकी जानकारी में इजाफा कर देगा। मगर बाजीचा ऐ अत्फाल (बच्चों के खेलने का मैदान) ने ऐसा उलझाया कि अब वाह-वाह से तौबा कर ली है।

योग से हो रहा तनाव

शरीर और मानसिक सेहत के लिए योग के फायदों से भला किसे इन्कार है। कोरोना संकट में भी यह कारगर रहा। जब इसकी तारीफ हुई तो सभी की पीठ थपथपाई गई। अब योग दिवस आने वाला है और आयोजन भी बड़ा होना है तो जिम्मेदारियों का बंटवारा हो रहा है। आयुष विभाग में इसकी जोर-शोर से तैयारियां जारी हैं। आदेश-निर्देश का आदान-प्रदान हो रहा है। ऊपर से आदेश है कि सब कुछ ठीक से नहीं, पिछली बार से बढ़कर काम होना चाहिए। जिम्मेदारियों का आसन लगाने में कुछ लोगों के सिर में दर्द हो रहा है। जिस दरवाजे से राहत पाने की आस थी, वहां से भी दो-टूक कह दिया गया कि अभी इस बारे में कोई सुनवाई नहीं होगी। योग का महत्व बताने वाले कुछ कर्मी इस समय जबरदस्त तनाव में हैं। कोई कारण पूछता है तो बता रहे हैं कि योग से तनाव हो रहा है।

मुखबिरी पड़ी भारी

कोरोना संकट में जब सरकारी आदेश के तहत घर पर थे तो मोबाइल पर बातचीत का सिलसिला घंटों चला। साहब से भी खैरियत पूछने के लिए फोन लगाए गए। कुछ-कुछ फुर्सत के पलों में नजदीकियां भी बढ़ गईं। साहब की नजरों में नंबर बढ़ाने के लिए यारों के बीच होने वाली चर्चाओं को भी बतौर मुखबिर पेश कर दिया। अब सब दफ्तर में हैं और साहब नई जानकारी मांग रहे हैं। दिक्कत यह है कि एक-दूसरे की खबरें देने वाले इस बात से अनजान हैं कि साहब को सब पता है। क्योंकि, एक ही घटना को अपने-अपने ढंग से देने की होड़ लगी है। एक ही घटना के पात्र और संवाद बदल रहे हैं। साहब भी एक से अधिक के सुनी बातों का विश्लेषण कर अनुमान लगा रहे हैं कि इनमें से यह सही है। साहब तक सूचनाएं पहुंचाने वालों को अब एक-दूसरे के कारनामों की खबर होने लगी है।

Posted By: Ravindra Soni

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