Coin Exhibition in Bhopal: भोपाल, नवदुनिया प्रतिनिधि। राज्य संग्रहालय के प्रदर्शनी कक्ष में भारत के प्राचीन दुर्लभ सिक्कों की प्रदर्शनी ' सिक्कों की विरासत" शुक्रवार से शुरू हुई। इस प्रदर्शनी में ईसा पूर्व सातवीं शताब्दी से लेकर मध्यकाल तक प्रचलित मुद्राओं को प्रदर्शित किया गया है। इन मुद्राओं से वस्तु विनिमय होता था। यह प्रदर्शनी 22 सितंबर तक देखी जा सकती है।

संचालनालय पुरातत्व अभिलेखागार एवं संग्रहालय के तत्वावधान में डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर पुरातत्व शोध संस्थान की ओर से आयोजित इन दुर्लभ सिक्कों का संग्रह अश्विनी शोध संस्थान, महिदपुर, जिला उज्जैन में डॉ. आरसी ठाकुर का है। इस प्रदर्शनी को सुबह 11 बजे से शाम पांच बजे तक नि:शुल्क देखा जा सकता है। राज्य संग्रहालय के पूर्व अध्यक्ष बी के लोखंडे ने बताया कि इस प्रदर्शनी में प्रदर्शित सिक्के इतिहास के लंबे कालखंड और उसमें प्रचलित विभिन्न धातुओं के सिक्कों की जानकारी देते हैं। ये सिक्के बहुमूल्य धातुओं जैसे स्वर्ण, चांदी, जस्ता, ताम्र आदि के हैं। यह सिक्के यह जानकारी देते हैं कि 27 सौ साल पहले सिक्कों को ढालने और उन पर अपने प्रतीक के ठप्पे लगाने की प्राविधि मौजूद थी। यह तत्कालीन समय में विज्ञान के उन्नात होने का सूचक है। लोखंडे के मुताबिक हमारे देश में 16 जनपदों के समय से सिक्कों का प्रचलन शुरू हो गया था। इन सिक्कों ने वस्तु विनिमय को प्रचलन से बाहर किया था।

उल्लेखनीय है कि भारत के सांस्कृतिक इतिहास में मुद्रा (सिक्के) का विशेष स्थान है। प्रारंभ में आमजन गाय को मुद्रा के रूप में मानते हुये अपनी आवश्यकताओं पूर्ति करते थे। लेकिन मुद्रा की इकाई के विभाजन में कठिनाई के कारण धातुओं के टुकड़े मुद्रा के रूप में चलाए गए। जिन्हें साहित्य में निष्क और कर्पाषण नाम से जाना जाता है। ईसा पूर्व 800 के लगभग सिक्कों का चलन प्रारंभ हुआ, जो मुद्रा के व्यवस्थित इतिहास का द्योतक हैं। तांबा, चांदी, सोना, जस्ता, शीशा आदि धातुओं के सिक्के चलाए गए। दुर्लभ सिक्कों की यह प्रदर्शनी विद्यार्थी, पुरातत्व के जिज्ञासु और आमजन के लिए उपयोगी और ज्ञानवर्धक है।

Posted By: Ravindra Soni

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