भोपाल, नवदुनिया प्रतिनिधि। कोरोना संक्रमण की पहली ठंड गरीबों पर भारी पड़ती जा रही है। दिन-ब-दिन सर्द होती रातों में इस बार बेसहारा लोगों को रैन बसेरा व अलाव का सहारा भी नहीं मिल पा रहा है। दरअसल, जिला प्रशासन के निर्देश पर नगर निगम ने लॉकडाउन के दौरान रैन बरसों को बंद कर दिया था। इसके बाद इन्हें शुरू नहीं किया गया। लिहाजा सर्दी के मौसम में कोरोना संक्रमण के कारण गरीबों के हालात ओर भी बदतर हो गए हैं।

लॉकडाउन खत्म होने के बाद आंशिक रूप से बसों व ट्रेनों का सिलसिला भी शुरू हो चुका है। ऐसे में लॉकडाउन के दौरान अपने गांव-कस्‍बे को वापस लौटे गरीब मजदूर वापस रोजगार की तलाश में नगरों-महानगरों की ओर लौटने लगे हैं। ऐसे वर्ग के लोगों के लिए रैन बसेरा का असरा होता था। शहर में नगर निगम के 15 रैन बसेरे हैं। इसमें हर साल 800 से ज्यादा लोग गुजर-बसर करते थे। बेबसों को लेकर नगर निगम द्वारा राहत के नाम पर दीनदयाल रसोई का संचालन जारी है। यहां पांच रुपये में लोगों को भरपेट भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है।

बंद रैन बसेरा के नीचे 50 से ज्यादा लोग रात गुजारने को मजबूर

नादरा बस स्टैंड स्थित रैन बसेरा के नीचे दयनीय हालात मिले। यहां पचास से ज्यादा लोग ठंडे फर्श पर सोते हुए मिले। स्थानीय दुकानदारों ने बताया कि पहले रैन बसेरा का सहारा लोगों को होता था। इसमें अधिकांश गरीब तबके के बेसहारा लोग ही होते हैं, लेकिन कोरोना काम मे बंद पड़े रैन बसेरों के कारण कई लोग जमीन पर ही रात काटने के लिए मजबूर हैं।

सर्द रातों में बेबसों के ऐसे हालात

- कंबल नहीं तो बोरे का सहारा

हबीबगंज रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म क्रमांक 1 की ओर जीआरपी थाने के पास लोग जमीन पर सोते हुए मिले। इसमें से दो वृद्ध महिलाएं बोरे को ओढ़कर सोते हुए मिलीं। रैन बसेरों में सोने के लिए कंबल व बिस्तर मिलता है।

- कुर्सी पर बिता रहे रात

आइएसबीटी में लोग कुर्सियों पर सोते हुए मिले, तो कुछ जमीन पर रात गुजारने को मजबूर थे। लोगों ने बताया कि दिन भर मजदूरी करने के बाद रैन बसेरा का सहारा होता था। इस बार यहीं रात गुजारने को मजबूर हैं।

- पार्किंग में ही गुजार रहे रात

भोपाल रेलवे स्टेशन की पार्किंग में लोग सोते हुए मिले। इसमें अधिकांश लोग दिहाड़ी मजदूरी करते हैं, जो पार्किंग के ठंडे फर्श पर सोने के लिए मजबूर हैं।

- खुले आसमान के नीचे पुल का आसरा

भोपाल टॉकीज ओवरब्रिज के फुटपाथ पर खुले आसमान के नीचे करीब एक दर्जन लोग रोजाना सोते हैं। यहां दुर्घटना का भी डर भी बना रहता है।

Posted By: Ravindra Soni

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