धनंजय प्रताप सिंह भोपाल। नईदुनिया बड़े-बड़े नामचीन नौकरशाह भी मान रहे हैं कि मध्यप्रदेश में कोरोना के भयावह तरीके से पैर पसारने के पीछे अफसरों की लापरवाही एक बड़ा कारण रही है। जब अफसरों को कोरोना संक्रमण रोकने के लिए रोडमैप तैयार करना था, तब वे यह देख रहे थे कि कमल नाथ सरकार गिरेगी या बचेगी और नई सरकार बनी तो मुख्यमंत्री कौन बनेगा।

इसी आपाधापी में अफसर कोरोना संक्रमण रोकने की दिशा में प्रभावी तरीके से काम ही नहीं कर पाए। इसके लिए राजनीतिक लोग भी पूरी तरह से जिम्मेदार हैं। संकट की घड़ी के समय प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री तुलसी सिलावट कमल नाथ सरकार गिराने के लिए बेंगलुरु में बैठे थे।

मार्च के इस एक माह में प्रदेश में तीन-तीन मुख्य सचिव रहे, लेकिन किसी ने भी कोरोना की रोकथाम के लिए रोडमैप पर काम नहीं किया। इसी का नतीजा आज देखने को मिल रहा है। हालात यहां तक खराब हैं कि शुरुआती दौर में डॉक्टरों को पीपीई किट तक नहीं मिले और उन्हें बगैर सुरक्षा के काम करना पड़ा। यही कारण है कि स्वास्थ्य विभाग के अफसर, डॉक्टर और कर्मचारी सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।

जिन प्रमुख सचिव स्वास्थ्य पल्लवी जैन गोविल पर पूरे प्रदेशवासियों की सेहत संभालने की बागडोर थी, लापरवाही की बदौलत वह खुद ही कोरोना की चपेट में आ गईं। इसके बाद भी उन्हें खुद के सरकारी अस्पतालों पर भरोसा नहीं इसलिए निजी अस्पताल में इलाज करवा रही हैं।

गंभीरता का आकलन करने में चूकी ब्यूरोक्रेसीः शर्मा

मप्र में सख्त, ईमानदार छवि वाले कुशल प्रशासक और पूर्व मुख्य सचिव केएस शर्मा का कहना है कि कोरोना को लेकर बिगड़े प्रदेश के मौजूदा हालात के आकलन में गंभीर प्रशासनिक चूक हुई है।

शुरुआती दौर में जब इसे नियंत्रित करने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए थे, तब प्रदेश राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा था। शीर्ष प्रशासनिक अमला भी पसोपेश में रहा। 15 दिन के अंदर तीन मुख्य सचिव होना, स्वास्थ्य विभाग द्वारा पुख्ता रोडमैप न बनाना, जिला स्तर पर लॉकडाउन की कार्रवाई में अपेक्षित सख्ती की कमी कोरोना के फैलाव के मुख्य कारण हैं।

इंदौर में लॉकडाउन के दौरान लोगों की भीड़ सड़कों पर देखी गई। भोपाल में लोग खुलेआम घूमते रहे। कोरोना पॉजिटिव होने के बाद भी अधिकारियों का रवैया गैर जिम्मेदाराना रहा। उन्हें घर में होना चाहिए लेकिन वे बैठकों में शिरकत करते रहे, जबकि दूसरों को शारीरिक दूरी बनाए रखने का पाठ पढ़ाया जा रहा है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि ब्यूरोक्रेसी द्वारा किस एप्रोच के साथ काम किया गया है।

चौहान ने दिखाई सक्रियता

वरिष्ठ नौकरशाह केएस शर्मा कहते हैं कि मुख्यमंत्री बनने के बाद शिवराज सिंह चौहान ने जरूर इसकी गंभीरता समझी और कदम उठाए हैं। अब सख्ती भी हो रही है लेकिन ब्यूरोक्रेसी अपनी भूमिका और क्राइसेस मैनेजमेंट के स्तर पर असफल रही है।

केस 1 - जनवरी में ही कोरोना ने दे दी थी आहट 27 जनवरी 2020 को मध्यप्रदेश में पहली बार कोरोना जैसे जानलेवा रोग के बारे में लोगों को तब पता चला, जब चीन के वुहान शहर से एमबीबीएस कर रहा एक युवक उज्जैन लौटा। इसे और उसकी मां को कोरोना मरीज मानकर आइसोलेशन में रखकर इलाज किया गया। रिपोर्ट निगेटिव आई। इसके बाद वुहान सहित दुनियाभर से प्रदेश में 12 हजार लोग और छात्र लौटे, जिन्हें लेकर भय का माहौल भी बना पर प्रशासन कोरोना के खतरे को भांप नहीं पाया।

केस 2 - सियासी उठापटक भी कम जिम्मेदार नहीं मप्र में सियासी उठापटक की शुरुआत तब हुई जब दो मार्च को पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने एक ट्वीट कर भाजपा पर विधायकों की खरीद फरोख्त का आरोप लगाया। इसके बाद से प्रशासनिक मिशनरी सियासी गुणा-भाग में उलझ गई। 10 मार्च 2020 को ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक छह मंत्री और 16 विधायकों ने बेंगलुरु में जाकर डेरा डाला तो सारा कामकाज ठंडा पड़ गया। इस बीच कमल नाथ सरकार भी गिरी और कामचलाऊ सरकार रही, इसके कारण अफसर सोते रहे। इस बीच राज्यपाल लालजी टंडन ने जरूर प्रयास किए और मुख्य सचिव सहित सभी वरिष्ठ अफसरों को बुलाकार कोरोना से बचाव की तैयारियों को लेकर हिदायत दी थी।

केस 3 - सियासी नियुक्तियां करने में व्यस्त रहे अफसर सियासी उथल-पुथल के इस दौर में कमल नाथ सरकार ने फाइलें तो खूब दौड़ाई पर कोरोना से बचाव की सामग्री खरीदने या किसी तैयारी की नहीं थी बल्कि सिर्फ सियासी नियुक्तियों की थी। आला अफसर भी कोरोना के खतरे को लेकर चिंतित नहीं थे, वे हाथों-हाथ फाइलें लेकर महिला आयोग से लेकर राज्य लोकसेवा आयोग में सियासी नियुक्तियों के आदेश निकालने में व्यस्त रहे।

केस 4 - कोरोना की भयावहता को समझने में असफल रहे मुख्य सचिव मार्च जैसे संवेदनशील महीने में मप्र में मुख्य सचिव की कमान तीन-तीन अफसरों ने संभाली। कमल नाथ सरकार में एसआर मोहंती के बाद मार्च में ही एम गोपाल रेड्डी को मुख्य सचिव बनाया। वे कुछ दिन रहे और फिर भाजपा सरकार बनने पर इकबाल सिंह बैंस ने प्रशासनिक मोर्चा संभाला। बैंस तो आने के बाद सक्रिय हुए लेकिन पूर्व के दोनों मुख्य सचिव कोरोना की भयावहता को समझने में असफल रहे।

पहले काम शुरू हो जाता तो नियंत्रण में रहता कोरोना

भोपाल-इंदौर दोनों ही जगह कोरोना वायरस फैलने के अलग-अलग कारण हैं। देरी तो हुई, मैंने तो 23 मार्च को शपथ ली फिर काम शुरू कर दिया। पर इंदौर के प्रभावित इलाकों में यदि बहुत पहले ही गंभीर समस्या मानकर काम शुरू कर दिया जाता तो जल्दी नियंत्रण पा लिया जाता। शिवराज सिंह चौहान, मुख्यमंत्री, मप्र

Posted By: Hemant Kumar Upadhyay

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