भोपाल (नवदुनिया प्रतिनिधि)।

आचार्य चतुर नारायण शास्त्री ने कहा है कि समस्त नदियां विराट नारायण की नाड़ियां हैं। वृक्ष विराट नारायण के रोमकूप हैं। वृक्षों को काटना मतलब विराट भगवान के रोम को काटने जैसा अपराध है। नदियों को दूषित करना मतलब विराट नारायण की नाड़ियों को दूषित करने का अपराध है।

आचार्यश्री ने अयोध्या बायपास रोड स्थित तिरुपति अभिनव होम्स में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन मंगलवार को यह बात कही। उन्होंने कहा कि विराट नारायण का अर्थ यह समाज है। हम सभी को पर्यावरण के प्रति सचेत होकर पर्यावरण की रक्षा करना चाहिए। नदियों को स्वच्छ बनाने और वृक्षों को बचाने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए। आचार्यश्री ने भक्त ध्रुव का चरित्र चित्रण करते हुए भक्त की निष्ठा, भगवान के प्रति समर्पण और एक भक्त की त्याग तपस्या का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि नर ही नारायण का स्वरुप है। जीव मात्र के प्रति हृदय में सदा दया का भाव रहना चाहिए। कथा में कपिलोपाख्यान के माध्यम से अष्टांग योग आदि का विस्तृत वर्णन करते हुए सृष्टि के निर्माण की कथा बड़ी रोचकता से सुनाई। सती जी का चरित्र व मां

अनुसुइया का चरित्र सुनाते हुए सती नारी की महिमा का वर्णन किया। कथा के समापन अवसर पर श्रीनरसिंह भगवान और भक्त प्रहलाद की बड़ी मनमोहक झांकी प्रस्तुत की गई। धार्मिक अनुष्ठान समिति के प्रमुख श्रीकांत अवस्थी ने बताया कि बुधवार को भगवान श्री कृष्ण को जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया जाएगा।

Posted By: Ravindra Soni

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