भोपाल(राज्य ब्यूरो)। पदोन्नति में आरक्षण मामले का फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मुद्दे तय कर दिए हैं। अब इन्हीं मुद्दों को आधार बनाकर केंद्र और राज्यों की सरकार पदोन्न्ति को लेकर निर्णय लेंगी, लेकिन मध्य प्रदेश के अधिकारियों और कर्मचारियों को पदोन्नति के लिए अभी और इंतजार करना पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचितजाति (एससी) एवं अनुसूचित जनजाति (एसटी) के डाटा को लेकर जो पैमाना तय किया है। उसके हिसाब से मध्य प्रदेश की पूरी तैयारी है, पर राज्य को लेकर फैसला अभी नहीं आया है। सुप्रीम कोर्ट 24 फरवरी से राज्यवार सुनवाई शुरू करेगा। पहले केंद्र सरकार के मामले सुने जाएंगे और फिर राज्यों के। तब मध्य प्रदेश का डाटा कोर्ट में पेश किया जाएगा। जिसके विश्लेषण के बाद प्रदेश के संदर्भ में फैसला आएगा।

प्रदेश के अधिकारियों-कर्मचारियों का पौने छह साल बाद भी पदोन्नति का इंतजार खत्म नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार के वकील मनोज गोरकेला कहते हैं कि सरकार ने जिन मुद्दों की ओर सुप्रीम कोर्ट का ध्यान दिलाया था। उन पर स्थिति अब साफ हो गई है। अब पदोन्नति के नए नियम बनाने की भी जरूरत नहीं है।

वे कहते हैं कि कोर्ट ने एससी-एसटी के जिस तरह के डाटा की बात की है, प्रदेश में वह तैयार है। हमारे पास संवर्गवार, वर्गवार और विभागवार डाटा उपलब्ध है। बस अब राज्य के संदर्भ में कोर्ट के फैसले का इंतजार है। गोरकेला कहते हैं कि 24 फरवरी से राज्यवार सुनवाई शुरू होगी, तब प्रदेश का डाटा कोर्ट में रखा जाएगा। उन्होंने बताया कि कोर्ट ने डाटा या रिव्यू का समय तय करने का दायित्व राज्यों की सरकार पर छोड़ दिया है। वर्ष 2006 में आए एम.नागराज फैसले को आधार बनाकर कुछ राज्यों में वर्ष 1994 वालों को पदावनत (रिवर्ड) कर दिया था। उन्हें भी राहत मिल गई है।

60 हजार कर्मचारी हो गए सेवानिवृत्त

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने वर्ष 2016 में 'मप्र लोक सेवा (पदोन्नति) नियम 2002" खारिज किया है। प्रदेश के कर्मचारी लगभग पौने छह साल से पदोन्नति का इंतजार कर रहे हैं। इस अवधि में 60 हजार से अधिक कर्मचारी सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इनमें से करीब 32 हजार कर्मचारियों को बगैर पदोन्नति के सेवानिवृत्त होना पड़ा है। सरकार ने वर्ष 2018 में सेवा की अवधि दो साल बढ़ाकर 62 साल कर दी थी। वरना, सेवानिवृत्त होने वालों का आंकड़ा 75 हजार के पार हो जाता।

कब क्या हुआ

- 30 अप्रैल 2016 : मप्र हाईकोर्ट ने पदोन्नति में आरक्षण समाप्त करते हुए 'मप्र लोक सेवा (पदोन्नति) नियम 2002" खारिज कर दिया। इस नियम से पदोन्नति लेने वाले एससी-एसटी कर्मचारियों को पदावनत करने के निर्देश दिए थे।

- 10 जून 2016 : हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।

- 12 जून 2016 : सुप्रीम कोर्ट ने प्रकरण की सुनवाई करते यथस्थिति का अंतरिम आदेश दिया।

- 14 नवंबर 2017 : अन्य राज्यों के प्रकरणों के साथ मप्र का प्रकरण वर्ष 2006 में आए एम.नागराज फैसले के मार्गदर्शी सिद्धांतों की समीक्षा के संविधान पीठ को भेजने का निर्णय लिया गया।

- 26 सितंबर 2018 : पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने एम. नागराज फैसले के सभी सिद्धांतों को सही ठहराते हुए पिछड़ापन के परीक्षण की शर्त खत्म कर दी, लेकिन क्रमिलेयर की बाध्यता को सुनिश्चित करने का आदेश दिया।

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Posted By: Hemant Kumar Upadhyay

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