भोपाल। गायकी में जैसे ताल के बिना सुर अधूरा है। वैसे ही बिन पखावज ध्रुपद सूना है। तबले से ध्रुपद की बनती नहीं और पखावज ध्रुपद को छोड़ चलता नहीं। पर अब पखावज अकेला रह गया, ध्रुपद के सुर खो गए। उमा-रमा की जोड़ी बिखर गई, पखावज से अखिलेश की ताल खो गई। सुर-ताल की जोड़ी तोड़ रमाकांत गुंदेचा दुनिया को अलविदा कह गए।

पद्मश्री ध्रुपद गायक रमाकांत गुंदेचा का शुक्रवार शाम निधन हो गया। उनका जन्म 24 नवंबर 1962 को हुआ था। वे 56 साल के थे।रमाकांत और उमाकांत गुंदेचा को पूरा देश गुंदेचा बंधु के नाम से जानता है।

हबीबगंज स्टेशन पर बैठकर ट्रेन का इंतजार कर रहे थे

उनके बड़े भाई उमाकांत गुंदेचा ने बताया कि एक कार्यक्रम के सिलसिले में जाने के लिए वे और उनके छोटे भाई रमाकांत पुणे जाने के लिए हबीबगंज स्टेशन पर बैठकर ट्रेन का इंतजार कर रहे थे। तभी अचानक रमाकांत को सीने में दर्द हुआ तो लगा कि शायद एसीडिटी की वजह से ऐसा हो रहा है। फिर जब दर्द तेज होने लगा तो एंबुलेंस को बुलाया गया। हालांकि जब तक एंबुलेंस आती तब तक उनका निधन हो चुका था। रमाकांत का अंतिम संस्कार सुबह 11 बजे सुभाष नगर विश्राम घाट पर किया जाएगा।

गुंदेचा बंधुओं का जन्म उज्जैन में हुआ था। रमाकांत संगीत और कॉमर्स में स्नातकोत्तर थे। गुंदेचा बंधु 1981 में भोपाल आ गए और यहां प्रोफेसर्स कॉलोनी में रहते थे। 1985 से उन्होंने सार्वजनिक रूप से ध्रुपद गायकी शुरू की। वर्ष 2004 में गुरु-शिष्य परंपरा के तहत उन्होंने भोपाल में ध्रुपद गुरुकुल की स्थापना की थी, जिसका उद्घाटन पंडित भीमसेन जोशी ने किया था। गुंदेचा बंधुओं को वर्ष 2012 का पद्मश्री पुरस्कार प्रदान किया गया।

Posted By: Hemant Upadhyay