शहर आए फिल्म डायरेक्टर अनिल शर्मा से बातचीत

भोपाल। नवदुनिया रिपोर्टर

देश की राजनीति में 56 इंच का सीना तो पहले से था,लेकिन सनी देओल के पॉलिटिक्स में आने से अब 62 इंच का सीना भी आ गया। लोग कह रहे हैं कि सनी देओल साफ छवि वाले शरीफ इंसान हैं, राजनीति उनके लिए नहीं है, लेकिन हर अच्छा इंसान यही सोचेगा तो राजनीति को कोई साफ कैसे करेगा... कोई तो चाहिए जो इस अंधेरे से मुक्ति दिलाए। सनी देओल के पॉलिटिक्स में आने के सवाल पर उनके साथ 'गदर : एक प्रेम कथा' समेत कई सुपरहिट फिल्में बना चुके बॉलीवुड डायरेक्टर- प्रोड्यूसर अनिल शर्मा ने यह बात कही। बुधवार को अनिल शर्मा शहर में आयोजित एक कार्यक्रम में शिरकत करने पहुंचे थे, इस दौरान उन्होंने बातचीत की। अनिल ने बताया कि सनी के राजनीति में आने के बाद से मैंने कई ट्वीट भी किए जिसे लोगों ने बहुत रीट्वीट की किया है।

हॉलीवुड में वर्ल्ड वॉर बेस्ड फिल्में बनती हैं तो हिंदुस्तान में गदर क्यों नहीं?

अनिल ने कहा कि मैंने 1981 में पहली फिल्म शूट की थी तब एक्शन का दौर शुरू ही हुआ था। दर्शकों को पिक्चर दिखानी है तो कैसे दिखाएं? मैंने हिरोशिमा जैसी घटनाओं के बारे में पढ़ा और देखा था। वहीं से मुझे आइडिया आया कि भारत-पाकिस्तान पार्टिशन को क्यों नहीं चुना जाए, क्योंकि जब हॉलीवुड में वर्ल्ड वॉर पर फिल्में बन सकती हैं तो फिर हिंदुस्तान में गदर जैसी फिल्में क्यों नहीं? अमेरिका अपने ही इतिहास पर फिल्में बना सकता है तो हम क्यों नहीं? तब मैंने सोच लिया था अब मैं इस फिल्म को बनाऊंगा।

'गदर' के दौरान लोगों ने कहा इससे फैल सकती है धार्मिक अंशाति

जब मैंने ठान लिया कि अब 'गदर' फिल्म बनाऊंगा तब मुझे बहुत सारे लोगों ने मना किया कि ये फिल्म क्यों बना रहे हो? इसमें दोनों समुदाय बुरा मान जाएंगे। यह फिल्म चलेगी नहीं। इससे हो सकता है धार्मिक अशांति फैल जाए। फिर मैं उन्हें यही कहता था कि जो सच घटना है वह दिखाने में बुराई क्या है। जो लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं उन लोगों के चेहरे दिखने तो चाहिए। हमेशा जब भी पार्टिशन होते हैं उनके भौगोलिक कारण हो सकते हैं, लेकिन यहां तो सीधे एक कागज पर लकीर से तय कर दिया गया कि आज से भारत- पाकिस्तान अलग सिर्फ एक स्वार्थ की वजह से। उस समय की क्या पारिस्थितियां रहीं होंगी मैं ये तो नहीं जानता, लेकिन अगर मैं उनकी जगह होता तो वो लकीर नहीं खींचने देता।

राजेश खन्ना का क्रेज देखकर फिल्मों में काम करने का सोचा

अनिल ने एक किस्सा शेयर करते हुए कहा कि मैं 1975 में मुंबई पहुंचा। एक दिन दादर स्टेशन से घर जा रहा था। तब मैंने देखा कि हर जगह सिर्फ और सिर्फ राजेश खन्ना की फिल्म के पोस्टर लगे हैं। मैंने वो दौर भी देखा था जब एक साथ उनकी 9 फिल्में सिनेमाघरों में चल रहीं थी। ऐसा पागलपन किसी भी हीरो के लिए कभी रहा ही नहीं। जब वे अपनी सफेद गाड़ी से आते थे तो लिपस्टिक से गाड़ी लाल हो जाती थी। लोग खून से लेटर लिखते थे। छलांग लगाकर नीचे कूद जाते थे। वो सब देखकर मेरा फिल्मों में काम करने का उत्साह बढ़ने लगा। मेरे पिताजी बीआर चोपड़ा को जानते थे उनकी बदौलत मुझे वहां अस्सिटेंट डायरेक्टर का काम मिला। काम करते-करते मैंने अपनी पहली फिल्म 'श्रद्घांजलि'डायरेक्ट की।

Posted By: Nai Dunia News Network

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