Doctor’s Day 2020 : दिलीप मंगतानी, भोपाल। थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों की सेवा का जुनून इन्हें बैठने नहीं देता। बच्चों की मदद करना अपना धर्म समझते हैं। ऐसे बच्चों के लिए इनकी क्लीनिक के दरवाजे हमेशा खुले रहते हैं, उनसे कोई फीस नहीं लेते। थैलेसीमिया प्रभावित बच्चों को हर 10 या 15 दिन में खून की जरूरत पड़ती है। रक्त की कमी को देखते हुए इन्होंने युवाओं की फौज तैयार कर दी है जो नियमित रूप से बच्चों के लिए रक्तदान कर रहे हैं।

बच्चों के दर्द को अपना दर्द समझने वाले चिकित्सक का नाम है डॉ. राकेश गुलानी। वे बताते हैं कि शिशु रोग विशेषज्ञ होने के बाद उनके पास कई ऐसे अभिभावक आते थे जिनके बच्चे थैलेसीमिया से पीड़ित हैं। डॉ. गुलानी बताते हैं कि बच्चों के लिए नियमित रूप से खून उपलब्ध कराना बड़ी समस्या थी। शुरुआत में कुछ युवाओं को रक्तदान के लिए तैयार किया। युवाओं को रक्तदान के फायदे बताए। धीरे-धीरे रक्तदान करने वालों की फौज खड़ी हो गई। बाद में हमने रक्तधारा सोशल वेलफेयर सोसायटी बनाई। इसके माध्यम से पीड़ित बच्चों को हर माह रक्त उपलब्ध कराया जा रहा है।

अब तक 30 हजार बच्चों को मिला खून

सोसायटी हर माह रक्तदान शिविर लगाती है। इसमें एकत्रित खून बच्चों को उपलब्ध कराया जाता है। अब तक सोसायटी के माध्यम से करीब 30 हजार बच्चों को रक्त उपलब्ध कराया जा चुका है। डॉ. गुलानी बताते हैं कि कुछ थैलेसीमिया प्रभावित बच्चे बोनमैरो ट्रांसप्लांट के बाद ठीक हो जाते हैं। ऐसे बच्चों के अभिभावक भी सोसायटी से जुड़कर दूसरे बच्चों के लिए रक्त उपलब्ध करा रहे हैं।

सेवा की ऐसी मिसाल मिलना मुश्किल

थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों को रोग से मुक्ति तभी मिलती है जब उसका बोनमैरो ट्रांसप्लांट हो जाए। यह आपरेशन महंगा होता है। आपरेशन से पहले ह्यूमन ल्यूकोसाइट एंटीजन जांच करवाना जरूरी है। यह जांच ही आमतौर पर 15 से 20 हजार रूपए में होती है। सोसायटी के माध्यम से डॉ. गुलानी हर साल विशेष शिविर लगाकर यह जांच निःशुल्क करते हैं। सोसायटी ने बोनमैरो आपरेशन के लिए भी अनेक बच्चों की मदद की है।

अनुवांशिक बीमारी है थैलेसीमिया

डॉ. गुलानी के मुताबिक थैलेसीमिया अनुवांशिक रोग है। यदि माता-पिता दोनों में थैलेसीमिया माइनर जीन है तो उनकी संतान थैलेसीमिया मेजर होगी। इस बीमारी में खून नहीं बनता। मरीजों को हर महीने खून चढ़ाना पड़ता है। कई माता-पिता विवाह से पहले अपने बच्चों की कुंडली के साथ थैलेसीमिया जांच भी कराने लगे हैं, जिससे थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों की संख्या कम हो रही है।

Posted By: Prashant Pandey

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