ड्रामा-जनजातीय संग्रहालय में भोजपुरी लोकनाट्य शैली में 'बिदेसिया' का मंचन

भोपाल। नवदुनिया रिपोर्टर

मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय में साप्ताहिक श्रृंखला अभिनयन के तहत शुक्रवार शाम जैनेद्र दोस्त (छपरा) के निर्देशन में भोजपुरी लोकनाट्य शैली में 'बिदेसिया' का मंचन संग्रहालय सभागार में हुआ। बिदेसिया भिखारी ठाकुर का सबसे प्रसिद्घ नाटक है। इस नाटक का मुख्य विषय विस्थापन है। इस नाटक में रोजी-रोटी की तलाश में विस्थापन, घर में अकेली औरत का दर्द, शहर में पुरुष का पराई औरत के प्रति मोह दिखाया गया है। दरअसल, नाटक की कहानी के केंद्र में रोजी-रोटी की जद्दोजहद में घर छोड़कर बाहर जाने वाले युवक की दास्तां है। वह शहर आकर अपनी पत्नी को भूल जाता है और दूसरी युवती को दिल दे बैठता है।

बिदेसी के साथ रखेलिन, गांव में पत्नी बेहाल

बिदेसिया की कहानी में गांव का एक युवक (बिदेसी) शादी के बाद अपनी नवब्याहता पत्नी (प्यारी सुंदरी) को छोड़कर रोजी-रोटी के लिए कलकत्ता कमाने चला जाता है। कलकत्ता में बिदेसी एक रूपवती स्त्री रखेलिन के चक्कर में फंसकर अपनी पत्नी प्यारी सुंदरी को भूल जाता है। उधर, गांव में प्यारी सुंदरी पति कि याद में रोती-बिलखती रहती है। अपना दुख कलकत्ता कमाने जा रहे बटोही को सुनाती है। बटोही उसे आश्वस्त करता है कि वो उसके पति तक उसका संदेश अवश्य ही पहुंचाएगा। बटोही कलकत्ता चला जाता है। इसी बीच गांव का एक मनचला युवक देवर बनकर सुंदरी से बलात्कार करने आता है। सुंदरी दृढ़ता और साहस से उस नकली देवर का मुकाबला करती है। उधर,कलकत्ता पहुंचने के बाद बटोही बिदेसी को खोज लेता है। उसे उसकी पत्नी प्यारी सुंदरी की स्थिति से अवगत कराता है। बिदेसी की चेतना लौटती है, वह घर लौटने का निश्चय करता है। रखेलिन इसका विरोध करती है, लेकिन अंततः बिदेसी वापस घर लौटता है। बिदेसी को वापस आया देख सुंदरी की खुशी का ठिकाना नहीं रहता। उधर, रखेलिन भी कलकत्ता से अपने दोनों बच्चों के साथ बिदेसी के गांव पहुंचती है। बिदेसी इन्हें देख अचंभित होता है। हां- ना और अनुनय-विनय के बाद सभी हिलमिल कर गांव में साथ रहने लगते हैं।

आन स्टेज

मंच पर रामचंद्र मांझी, शिवलाल बारी, लखीचंद मांझी, शंकर राम, रघु पासवान, जगदीश राम, राजकुमार और जैनेन्द्र दोस्त आदि ने अपने ग्रामीण और शहरी लहजे के साथ अभिनय कौशल से दर्शकों को प्रभावित किया।