-ड्रामा इन सिटी

- भारत भवन में मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर नाटक 'शतरंज के खिलाड़ी' का मंचन

भोपाल। नवदुनिया रिपोर्टर

भारत भवन में बुधवार की शाम नाटक 'शतरंज के खिलाड़ी' का मंचन हुआ। प्रसिद्ध साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर मंचित यह नाटक कालजयी रचनाकार की रचना पर पड़ी यादों की धूल को झटकता नजर आया। प्रस्तुति के निर्देशक दिनेश नायर कहते हैं कि प्रेमचंद का साहित्य सिर्फ पठन तक सीमित नहीं है। यह रंगमंच के लिए भी उत्कृष्ट और संदेशपरक जरिया है, जो अभिनय विधा के साथ दर्शकों तक पहुंच बनाता है। इस प्रस्तुति में रंगमाध्यम नाट्य संस्था के कलाकारों ने शानदार अभिनय किया। एक घंटे 30 मिनट के इस नाटक में कलाकारों ने 1857 की क्रांति को एक बार फिर से दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत किया। दर्शकों ने भी इस क्रांति की आग को महसूस किया।

-कपड़े से बनाए 'स्कर्टल सेट'

निर्देशक दिनेश नायर ने बताया कि इस प्रस्तुति के लिए हमने स्कर्टल सेट का उपयोग किया। इसमें नाटक के जितने भी प्रॉप्स हैं, वे सभी आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाए जा सकते है। इन्हें अलग- अलग तरह के फेब्रिक का उपयोग करके तैयार किया है। प्रस्तुति के समय इन्हें तुरंत बांधकर सेट तैयार हो जाता है। यह प्रॉप्स लंबे समय तक चलते है, वहीं नाटक में लाइव म्यूजिक का इस्तेमाल किया गया। इसमें ठुमरी और कथक के साथ फेमस गीत 'बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए...' गीत पर प्रस्तुति के जरिए उस दौर का वातावरण तैयार किया गया।

-जागीरदारों का शतरंज प्रेम

प्रस्तुति की शुरुआत में गायन-वादन के दृश्य के साथ होती है, जिसमें लखनऊ की खूबसूरती को दिखाया गया। इस शहर की राजनीतिक सामाजिक चेतना शून्य हो गई है। यहां के नवाब भोग विलास में डूबे हुए हैं। मिर्जा सज्जााद अली और मीर रोशन अली दोनों वाजिद अली शाह के जागीरदार हैं। जीवन की बुनियादी जरूरतों के लिए उन्हें कोई परवाह नहीं है। दोनों खास दोस्त हैं और शतरंज खेलना उनका पसंदीदा खेल है। दोनों का ज्यादातर समय शतरंज के साथ नाश्ता, खाना, पान और तंबाकू के साथ बितता है। एक दिन मिर्जा सज्जााद की पत्नी बीमार हो गई, लेकिन दोनों तब भी शतरंज खेलने में लगे रहे। उनकी इस आदत को देखते हुए परेशान होकर मिर्जा सज्जााद की पत्नी ने शतरंज फेंक दी।

-कैद कर लिए गए नवाब

शतरंज फेके जाने के बाद शतरंज का खेल मीर रोशन अली के घर में होने लगा। रोज-रोज के इस खेल से उनकी पत्नी भी परेशान हो गई। एक दिन दोनों मित्र शतरंज की बाजियों में खोए हुए थे कि तभी बादशाह की फौज का एक अधिकारी मीर साहब का नाम पूछता है। उसे देखते ही मीर साहब के होश उड़ जाते हैं। उन्होंने देखा कि अंग्रेजी फौज गोमती के किनारे-किनारे चली आ रही है। अंतिम सीन में दिखाया कि मीर साहब, मिर्जा को हड़बड़ी में यह बात बताते हैं कि नवाब वाजिद अली शाह कैद कर लिए गए हैं।