समाज में 'सभ्यता' की चादर ओढ़े घूम रहे भेड़िए

- भारत भवन में नाटक का मंचन

भोपाल। नवदुनिया रिपोर्टर

भेड़िए, यह सुनकर ही हम किसी खूंखार जंगली जानवर की कल्पना करने लगते हैं, लेकिन क्या यह सिर्फ जंगल में पाए जाते हैं या समाज में 'सभ्यता' की चादर ओढ़े घूम रहे हैं। हमें इनकी उपस्थिति की भनक तब तक नहीं लग पाती, जब तक किसी स्थिति-परिस्थिति में फंस कर इनकी सभ्यता की चादर फट नहीं जाती। भारत भवन में शनिवार की शाम नाटक 'खारू का खरा किस्सा' का मंचन हुआ। एक घंटे तीन मिनट की इस प्रस्तुति में जीवन की घातक परिस्थितियों और उनसे उबरने के लिए गए अंर्तद्वंद्व को पेश किया गया है।

नाटक भुवनेश्वर की कहानी भेड़िए पर केंद्रित है। इस कहानी का नाट्य रूपांतरण सुमन कुमार और निर्देशन प्रवीण शेखर ने किया। इस नाटक की यह 12वीं प्रस्तुति रही, जिसमें बैकस्टेज संस्था, इलाहाबाद के कलाकारों ने अभिनय किया।

-सामाजिकता व इंसानियत कर रहे शर्मसार

प्रस्तुति के निर्देशक प्रवीण शेखर कहते हैं कि हम कई बार अपने आस-पास ऐसी अमानवीय घटनाओं को घटित होते हैं, जिन्हें देखकर विश्वास नहीं होता कि ऐसा भी कोई मनुष्य कर सकता है। इस नाटक के माध्यम से हमने यही दिखाने का प्रयास किया है। भेड़िए सिर्फ पशु भेड़िए नहीं है, बल्कि वो भी हैं जो हमारे आसपास हैं। सामाजिकता व इंसानियत शर्मसार कर रहे हैं। समाज की बुराई पर करारा प्रहार करती इस कहानी में पिता-पुत्र के रिश्ते और अगली पीढ़ी की चिंता है। दूसरी विपरीत स्थितियों के बीच प्रेम भी है। नाटक में अवधी व भोजपुरी गीतों को नाटक की परिस्थितियों के अनुसार बदलाव के साथ शामिल किया है। नाटक में बिदेसिया और राह गीत भी रहे। रहिया के जाते बटोही मोरे भैया... बिदेसिया और चलल जाल चलल जाल चलल जाल है सड़किया पे गाड़ी हमार बैलगाड़ी...आदि गीत शामिल थे।

-खुद बिकने गई लड़कियां

नाटक की कहानी खारू और उसके पिता के मंच पर आने से शुरू होती है। वे दोनों मेलों में इंसानों को पशुओं की तरह बेचते है। पंजाब में उत्तर भारत की लड़कियों को बहुत पसंद किया जाता है। तीन लड़कियां अपनी मर्जी से यह सोचकर वहां बिकने जाती हैं कि अच्छा घर मिल जाएगा। खारू और उसके पिता तीनों लड़कियों को लेकर बैलगाड़ी से निकलते हैं। रास्ते में कुछ जंगली भेड़िए उनका पीछा करने लगते हैं। जब कोई और रास्ता नहीं बचता तो बैलगाड़ी को तेज भगाने हल्का करने की जरूरत होती है।

अगली पीढ़ी के प्रति मोह

गाड़ी को हल्का करने के लिए रखे सामान को फेंका जाता है। इसके बाद तीनों लड़कियों को एक-एक कर फेंका जाता है। अब इस ही बीच एक लड़की, जिससे खारू प्रेम करता है, उसे फेंकने में हिचकिचाता है। मौत के पंजे से जिंदगी को लेकर भागते पिता-पुत्र की कहानी के बीच प्रेम का यह धागा अद्भुत दृश्य का निर्माण करता है, लेकिन उस लड़की को भी फेंकना पड़ता है। अंत में खारू और उसके पिता में से किसी एक को भी उसमें से कूदना होता है। तब खारू का पिता अगली पीढ़ी के प्रति मोह को देख खुद कूदने का फैसला लेता है।