भोपाल (नवदुनिया रिपोर्टर)। राजधानी भोपाल में स्थित मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय में आयोजित गमक श्रृंखला के अंतर्गत शुक्रवार को आदिवासी लोककला एवं बोली विकास अकादमी द्वारा कपिल चौरसिया और साथी, सागर द्वारा बुंदेली लोकगायन और रीवा के राजमणि तिवारी एवं साथी द्वारा दुलदुलघोड़ी नृत्य की प्रस्तुति हुई। प्रस्तुति की शुरुआत कपिल चौरसिया और साथियों द्वारा बुंदेली लोकगायन से हुई, जिसमें ईसुरी चौकड़िया वंदना मोरी खबर शारदा लइयें..., हरदौल लाला गीत- नजरियों के सामने तुम हरदम लाला रहियो..., जेवनार गीत- रामचंद्रजी जेवन बैठे..., श्रृंगार लोकगीत- कोनऊ देख ले हे मुइया बहाने से गोरी..., पनिहारी लोकगीत- पनघट पे झोका खावे री..., बंबुलिया गीत निकर चलो दे के टटिया रे... एवं ख्याल गीत जागे नैया भोला जगा हारी जागे न ... आदि बुंदेली लोकगीत प्रस्तुत किए। प्रस्तुति में ढोलक पर रमेश चौरसिया, मंजीरा पर गणेश प्रसाद चौरसिया, तबले पर राकेश कटारया, बांसुरी पर मनोज शिल्पकार, बैंजो पर विजय बड़वानी एवं नगड़िया पर रीतेश चौरसिया ने संगत दी।

दूसरी प्रस्तुति राजमणि तिवारी और साथियों द्वारा दुलदुलघोड़ी नृत्य की हुई, जिसमें राजमणि तिवारी, रत्नेश गोस्वामी एवं राजवीर तिवारी ने नृत्य प्रस्तुति दी एवं हारमोनियम पर प्रमोद साहू, ढोलक पर रोहन वर्मा,तबले पर रावेंद्र मिश्रा, नगरिया पर रामहित साकेत, खजनी पर मिथुन साकेत और झांझ पर जगन्नाथ साकेत ने संगत दी। भारतवर्ष में पुरातन काल से ही रूपधारण करके नृत्य करने की परंपरा है। मध्यभारत में नृत्यों के बिना कोई मेला, त्यौहार, समारोह, संस्कार को संपूर्ण नहीं माना जाता है, भारत में दुलदुलघोड़ी लोकनृत्य मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु आदि सभी जगह प्रमुखता से किया जाता है। दुलदुल घोड़ी नृत्य को घोड़ी नृत्य, लिल्ली घोड़ी नृत्य आदि नामों से भी जाना जाता है।

Posted By: Ravindra Soni

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