कोई आया था अंधेरे में पड़ोसी बनकर...

- दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय में संगोष्ठी

भोपाल। नवदुनिया रिपोर्टर

दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय में मंगलवार को ओपन बुक्स ऑनलाइन, भोपाल चैप्टर की मासिक साहित्यिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस मौके पर जहीर कुरैशी की गजल 'रात के एक बजे द्वार न खोला उसने, कोई आया था अंधेरे में पड़ोसी बनकर' बहुत सराही गई। अशोक पंडित 'अक्स ही बिखरे हुए हैं, आइनों की बात क्या? बाग सब उजड़े हुए हैं, ख़ुश्बुओं की बात क्या?' ने सभी का ध्यान आकर्षित किया। किशन तिवारी ने सुनाया 'ुल्म की दास्तां सोचिए तो सही, आदमी बेजुबां सोचिए तो सही'। बलराम धाकड़ की गजल 'ये मेरा लहजा, मेरा लहजा नहीं है दोस्तो, मेरा मुझमें कुछ नहीं है, सिर्फ आईना हूं मैं' बहुत सराही गई। मनीष श्रीवास्तव 'बादल' ने दोहों से समा बांध दिया। उन्होंने ' सोच-समझ कर बोलिए, रहे न कोई खेद, नाव डुबोने के लिए, एक बहुत है छेद' और 'बूंद ओस की कर रही, फूलों पर विश्राम, सेज न उनकी तोड़िए, ले पूजा का नाम' सुनाकर श्रोताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया।

Posted By: Nai Dunia News Network

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