भोपाल। कोलार अपना घर वृद्धाश्रम के बुजुर्ग हर गुरुवार बच्चों की पाठशाला लगाते हैं। शाम 4.30 से 6.30 बजे तक लगने वाली पाठशाला की खास बात यह है कि इसमें छह से 16 साल तक के बच्चों को किताबी ज्ञान नहीं बल्कि नैतिक मूल्यों की पढ़ाई कराई जाती है। कक्षा में ऐसे बुजुर्ग जिन्हें बेटे-बेटियों और बहुओं ने घर से निकाल दिया है। वह बच्चों को अपनों से दूर होने का दर्द बताते हैं। उन्हें समझाते हैं कि चाहे कुछ भी हो जाए बुढ़ापे में माता-पिता को घर से नहीं निकालना। इस विशेष पाठशाला का उद्देश्य समाज में आए नकारात्मक बदलाव को रोकना है, जिससे बच्चे बड़े होकर अपने माता-पिता का सम्मान करें और उन्हें घरों से निकाल कर वृद्धाश्रम न छोड़ें।

अपना घर वृद्धाश्रम में करीब 20 साल से रहे बुजुर्ग प्रेम नारायाण सोनी और साधना पाठक ने बताया कि हमने अपने बच्चों की बेहतर ढंग से परवरिश की। उन्हें पढ़ा-लिखा कर बड़ा किया, लेकिन जब हम बूढ़े हो गए तो उन्होंने हमें घर से निकाल कर वृद्धाश्रम छोड़ दिया। ऐसी स्थिति बुढ़ापे में किसी के भी साथ न बने, इसलिए नई पीढ़ी के बच्चों की बाल चौपाल लगा रहे हैं, जिससे बच्चे संस्कारवान बनें और जन्म देने वाले माता-पिता का सम्मान करें, घर से निकाल कर उनकी आंखों में आंसू न आने दें।

बुजुर्ग खेल-खेल में बच्चों को पढ़ाते हैं नैतिक मूल्यों का पाठ

आश्रम में 24 बुजुर्ग हैं। इनमें 12 महिलाएं व 12 पुरुष हैं। पाठशाला में सभी बुजुर्ग उपस्थित रहते हैं। यहां आने वाले 60 से 70 बच्चों के साथ खो-खो, सांप-सीढ़ी, कैरम, सितोलिया सहित अन्य परंपरागत खेल खेलते हैं। खेल-खेल में बच्चों को जीवन में माता-पिता का सम्मान करना, उनकी बात मानना, बुढ़ापे में उनका सहारा बनने के बारे में बताते हैं। इतना नहीं सप्ताह में किसी दिन एक-एक बच्चों के घर जाते हैं, उनके माता-पिता से बच्चों में आए बदलाव के बारे में पूछते हैं। माता-पिता से भी कहते हैं कि बच्चों को साथ तालमेल बैठा कर चलें।

किसी को लकवे की शिकायत तो कुछ को आंखों से दिखता है कम

वृद्धाश्रम की संचालिका माधुरी मिश्रा बताती हैं कि आश्रम में रहने वाले बुजुर्ग 60 से 75 साल की उम्र के हैं। किसी को लकवे की शिकायत है तो कुछ को आंखों से कम दिखता है। अपनों से दूर रहने का दुख भी है, फिर भी आश्रम के बुजुर्ग समाज में बदलाव लाने नई पीढ़ी के बच्चों की पाठशाला लगाते हैं, ताकि वह बड़े होकर अपने मां-बाप को वृद्धाश्रम न भेजें। बुजुर्ग दादा-दादी का मन बच्चों के बीच रह कर प्रसन्न हो जाता है। वृद्धाश्रम में सब एक परिवार के तरह रहते हैं।