Bhopal Electricity News: भोपाल (नवदुनिया प्रतिनिधि)। कहते हैं न कि कहीं भी छोटे आदमी की ही मरण होती है। यह कहावत आम बिजली उपभोक्ताओं पर सटीक बैठ रही है। मप्र मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी भोपाल शहर के 99 फीसद बड़े व रसूखदार उपभोक्ताओं को खपत के मुताबिक एकदम सही बिल दे रही है, जबकि चार हजार से अधिक छोटे व आम उपभोक्ताओं को हर महीने गड़बड़ बिल भेज देती है। इनमें सुधार के लिए उपभोक्ता जूझते रहते हैं। 50 फीसद बिलों में सुधार होता है, बाकी लोग चक्कर लगाते रहते हैं। थक-हारकर अधिक बिल जमा कर देते हैं। शहर में ऐसे कई उदाहरण हैं।

दरअसल, 10 किलोवाट से अधिक लोड के उपभोक्ताओं के मीटरों में मीटर रीडिंग इंस्ट्रूमेंट लगे होते हैं, इसलिए रीडिंग में गड़बड़ी की संभावना बिल्कुल भी नहीं होती। वहीं 18.5 किलोवाट व उससे अधिक लोड के उपभोक्ताओं के मीटरों की रीडिंग ऑटोमेटिक होती है। जिनके बिल 100 फीस सही होते हैं। वहीं, घरेलू उपभोक्ताओं के यहां साधारण डिजिटल मीटर लगे हैं। इनमें मीटर रीडिंग मैनुअली कराई जा रही है। मीटर रीडर कई बार भूलवश रीडिंग लेने में गलती कर देते हैं, तो कुछ जगह रीडिंग लेने में जबरन गलतियां कर दी जाती हैं। इन गलतियों को पकड़ने के लिए बिल वितरण से पूर्व उनकी जांच करनी चाहिए, ताकि 100 फीसद शुद्धता बनी रहे। लेकिन कंपनी के पास अमले की कमी है, इसलिए 95 फीसद बिल बिना जांच के उपभोक्ताओं तक पहुंच जाते हैं। बता दें कि बीते 14 महीने में बिजली कंपनी ने शहर के 20 हजार से अधिक उपभोक्ताओं को गड़बड़ बिल दिए। इनमें से 10 हजार के बिलों में ही सुधार किया है।

बड़े उपभोक्‍ताओं से डर की वजह

बिजली कंपनी के एक सेवानिवृत्त अधिकारी ने बताया कि बड़े उपभोक्ताओं से अधिक राजस्व मिलता है। वे किसी भी तरह की गड़बड़ी बर्दाश्त नहीं करते। कोर्ट तक चले जाते हैं, इसलिए कंपनी उनके साथ गड़बड़ी करने से भय खाती है। छोटे उपभोक्ता वितरण केंद्रों तक शिकायत करके रह जाते हैं। थक-हारकर बिल जमा कर देते हैं।

आंकडों से समझें

- 4.50 लाख उपभोक्ता हैं शहर में।

- 30 हजार औद्योगिक क्षेत्र के उपभोक्ता हैं।

- 20 हजार से अधिक उपभोक्ता 10 व 18.5 किलोवाट के हैं।

- 4 हजार उपभोक्ता हर माह करते हैं गड़बड़ बिल की शिकायतें।

अप्रैल में रीडिंग लेने नहीं आए। औसत रीडिंग के हिसाब से बिल दे दिया। सुधार की मांग की तो सुनवाई नहीं की, इसलिए बिल जमा नहीं किया। मई में रीडिंग ली और 11 हजार से अधिक का बिल दे दिया। सुधार करने की मांग की तो कहने लगे, खपत हुई है। इतना ही बिल भरना पड़ेगा। कोई विकल्प नहीं था, इसलिए बिल जमा करना पड़ा।

- राकेश दीक्षित, भरत नगर, भोपाल

Posted By: Ravindra Soni

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