दारोगा जी : शहर के विभिन्न थानों में नौकरी करने के बाद वर्तमान में वह थानेदार बने। सरकार के नए आदेश के बाद उन्हें कार्यवाहक निरीक्षक तो बना दिया गया, लेकिन नौकरी उन्हें अपने समकक्ष थानेदार के अधीन करना पड़ रही थी। उधर, उनके सेवानिवृत्‍त होने में भी महज दो माह ही शेष रह गए थे। रिटायरमेंट के पहले स्वतंत्र रूप से थाना संभालने की हसरत बलवती भी हो रही थी। आखिर हिम्मत जुटाकर कार्यवाहक निरीक्षक वीरेंद्र सिंह ने अपनी इच्छा से डीआइजी इरशाद वली को अवगत करा दिया। डीआइजी ने भी दरियादिली दिखाते हुए उन्हें ईंटखेड़ी थाने की कुर्सी संभालने का आदेश जारी कर दिया। ईंटखेड़ी की कमान अभी तक थानेदार करन सिंह के पास थी। करन सिंह को भी बेटी की शादी के लिए लंबी छुट्टी चाहिए थी। सो साहब ने उनकी छुट्टी मंजूर कर ली और इनको टीआइ साहब बना दिया। देखना यह कि छुट्टी से लौटने के बाद करन सिंह को क्या जिम्मेदारी मिलती है।

घोड़े की बला, तबेले के सिर

राजधानी के अधिकांश थाना प्रभारी साइबर ठगी के थोक मामले दर्ज करने को लेकर परेशान हैं। एक से दो वर्ष पहले क्राइम ब्रांच की साइबर विंग में हुई धोखाधड़ी की शिकायतें अब फरियादियों के पते के आधार पर संबंधित थानों पर थोप दी गई हैं। थानों में उन शिकायतों पर एफआइआर की जा रही है। एक तो थानों में साइबर अपराध की तकनीकी जांच के संसाधन भी नहीं हैं, दूसरा मामले इतनी देरी से दर्ज हुए हैं कि उनमें आरोपितों को पता लगना काफी मुश्किल है। इस मामले में शिकायतकर्ताओं की भी खासी फजीहत हो रही है। ऑनलाइन ठगी में लुटे लोगों ने पहले क्राइम ब्रांच के चक्कर लगाकर अपने बयान दर्ज कराए। अब दोबारा उन्हें थानों से बुलावा आ रहा है। ज्ञात हो कि दो वर्ष पहले आला अफसरों ने क्राइम ब्रांच में साइबर विंग की तारीफ में जमकर कसीदे पढ़े थे। लंबित मामलों से पल्ला झाड़ने से साइबर विंग की कलई भी खुल गई है।

रास्ते से भटकी ट्रैफिक पुलिस

बेहतर ट्रैफिक के लिए यातायात सप्ताह के बजाय राजधानी में यातायात माह मनाया गया था। जागरुकता के लिए जगह-जगह कार्यक्रम किए गए। नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से भी लोगों को यातायात के नियम का पालन करने की सीख दी गई थी, लेकिन यह तमाम कवायद महज नौटंकी बनकर रह गई है। ट्रैफिक पुलिस सिर्फ वाहन चेकिंग तक सीमित रह गई है। शहर में चिन्हित किए गए ब्लैक स्पॉट्स को दूर करने के लिए संबंधित निर्माण एजेंसियों के साथ जैसे-तैसे सामंजस्य भी बना था। काम शुरू भी किया जाना था, लेकिन आधा वर्ष बीतने पर भी सड़कों से जोखिम हटाने का काम कागजों में है। उधर, शहर में फिर सड़क हादसों में तेजी आने लगी है। विशेषकर शहर के सीमावर्ती थाना क्षेत्रों में बने ब्रिज दुर्घटना संभावित क्षेत्र बन गए हैं। इसके बाद भी ट्रैफिक पुलिस उन कारणों को खोजने में रुचि नहीं ले रही, जिनकी वजह से लोगों की जान जा रही है।

आइसोलेशन से कब निकलेगा रेमडेसिविर चोरी का मामला

हमीदिया अस्पताल के स्टोर से चोरी गए 863 रेमडेसिविर इंजेक्शन का मामला घटना के बाद देशभर में सुर्खियों में छा गया था। आनन-फानन एफआइआर भी दर्ज हुई। शुरुआती जांच में ही पता चला कि इंजेक्शन निकालने के बाद ताले डाले गए। घटना को चोरों की करतूत बताने के लिए स्टोर के पीछे की ग्रिल तो काटी गई, लेकिन ग्रिल स्टोर के अंदर से काटे जाने की पुष्टि होने के बाद अस्पताल प्रबंधन ने चुप्पी साध ली। सच का पता लगाने के लिए क्राइम ब्रांच ने अस्पताल प्रबंधन के मुखिया को तलब कर लिया। पूछताछ के बाद बंद कमरे में जब रसूखदारों के नाम सामने आना शुरू हुए, तो पुलिस की पेशानी पर भी पसीना आ गया। इस बीच खबर भी आ गई कि इंजेक्शन चोरी नहीं गए थे। गलती से दूसरे बॉक्स में रख दिए गए थे। तीन माह से कोरोना की संजीवनी चोरी का मामला आइसोलेशन में रखा गया है।

Posted By: Ravindra Soni

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