भोपाल। प्रथम पूज्य को समर्पित दस दिवसीय गणेशोत्सव की 2 सितंबर से शुरुआत हो रही है। पर्व को लेकर बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों सभी में उत्साह है। सभी अपने-अपने ढंग से पर्व को मनाने की तैयारी में जुटे हैं। यदि बात की जाए शिक्षित युवाओं की, तो उनके नजरिए में गणपति बप्पा का व्यक्तित्व, उनकी आकृति प्रेरक सीख देती है। जो जीवन के पथ पर सफलता दिला सकती है। इनके अंग में कौशल और व्यक्तित्व निखारने का रहस्य छिपा हुआ है। आज गणेश चतुर्थी के अवसर पर हम श्रीगणेश के अंगों के महत्व की जानकारी प्रदान कर रहे हैं।

पारखी यानी छोटी आंख

गणपति की आंखें छोटी हैं। अंग विज्ञान के अनुसार छोटी आंखों वाला व्यक्ति चिंतनशील और गंभीर प्रवृत्ति के होते हैं। गणेशजी की छोटी आंखें हमें यह ज्ञान देती हैं कि हर चीज को सूक्ष्मता से परखकर ही निर्णय लेना चाहिए। ऐसा करने वाला व्यक्ति कभी धोखा नहीं खा सकता।

सूंड में सक्रियता का संदेश

गणेशजी की हर पल हिलती-डुलती सूंड हमें निरंतर सक्रिय रहने का संदेश देती है। यह हमें सिखाती है कि जीवन में सदैव सक्रिय रहना चाहिए, ऐसा करने वाला व्यक्ति कभी दुख और गरीबी का सामना नहीं करना पड़ता है।

बड़ा पेट यानी बातों को पचाने का ज्ञान

गणेजी को बड़े पेट के कारण लंबोदर भी कहा जाता है। लंबोदर होने का कारण यह है कि वे हर अच्छी और बुरी बात को पचा जाते हैं। किसी भी बात का निर्णय सूझबूझ के साथ लेते हैं। अंग विज्ञान के अनुसार बड़ा उदर खुशहाली का प्रतीक है। गणेशजी का बड़ा पेट हमें ज्ञान देता है कि भोजन की तरह की हमें बातों को भी पचाना सीखना चाहिए। जो व्यक्ति ऐसा कर लेता है, वह हमेशा ही खुशहाल रहता है।

नेतृत्व क्षमता का प्रतीक बड़ा मस्तक

गणेशजी का मस्तक काफी बड़ा है। अंग विज्ञान के अनुसार बड़े सिर वाले व्यक्ति नेतृत्व करने में योग्य होते हैं। इनकी बुद्धि कुशाग्र होती है। गणेशजी का बड़ा सिर यह भी ज्ञान देता है कि अपनी सोच को बड़ा बनाए रखना चाहिए।

बुद्धि-विवेक के प्रतीक लंबे कान

गणेशजी के कान बड़े हैं, इसलिए इन्हें गजकर्ण व सूपकर्ण भी कहा जाता है। लंबे कान वाले व्यक्ति भाग्यशाली और दीर्घायु होते हैं। गणेशजी के लंबे कानों का एक रहस्य यह भी है कि वह सबकी सुनते हैं, फिर अपनी बुद्धि और विवेक से निर्णय लेते हैं। यह खूबी हमें बड़े काम के दौरान हमेशा चौकन्न रहने की शिक्षा देती है। गणेशजी के सूप जैसे कान से यह शिक्षा मिलती है कि जैसे सूप बुरी चीजों को छांटकर अलग कर देता है, उसी प्रकार जो भी बुरी बातें आपके कान तक पहुंचती हैं, उसे बाहर ही छोड़ दें। बुरी बातों को अपने अंदर न आने दें।

सदुपयोग का प्रतीक एकदंत

बाल्यकाल में भगवान गणेश का परशुरामजी से युद्ध हुआ था। इस युद्ध में परशुराम ने अपने फरसे से भगवान गणेश का एक दांत तोड़ दिया और वे एकदंत कहलाने लगे। गणेशजी ने अपने टूटे हुए दांत को लेखनी बना लिया और इससे पूरा महाभारत ग्रंथ लिख डाला। यह गणेशजी की बुद्धिमत्ता का परिचय है। गणेशजी अपने टूटे हुए दांत से यह सीख देते हैं कि चीजों का सदुपयोग किस प्रकार किया जाना चाहिए।

Posted By: Saurabh Mishra

fantasy cricket
fantasy cricket