- सर्वजगत जीवों के कल्याण की भावना को लेकर मंत्रोचारित शांतिधारा

भोपाल। नवदुनिया प्रतिनिधि

जीवन में सुखी होने का मूलमंत्र स्वावलंबी बनो पर किसी से अपेक्षा और उपेक्षा मत करो। अपनी समता पर भरोसा रखो पर अभिमान मत करो।

उक्त विचार चौक स्थित जैन धर्मशाला में चल रही धर्मसभा में मुनि निकलंक सागर महाराज ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि भोजन या भोजन के लिए जीवन। इस रहस्य को समझो जिसने इस रहस्य को समझ लिया, उसने संसार की जटिलताओं को समझ लिया। प्रभु भजन से इंद्रिय सुख के साथ आत्मिक सुख प्राप्त होता है। मुनिश्री ने कहा कि जीवन की कुंडली व्यक्ति के कर्म से बनती है। तन की कुंडली जन्म से बनती है। हम तन की नहीं हम अपने कर्म की कुंडली देखकर उस पर विश्वास करें। सभी ग्रंथों में जीवन का ग्रंथ सबसे बड़ा ग्रंथ है। इसे पढ़ने का और पढ़कर अपने में ढालने का प्रयास करें। जीवन एक कर्मभूमि है कर्म को करा, लेकिन लक्ष्य को सामने रखो। लक्ष्य विहीन कर्म कभी भी मंजिल पर नहीं पहुंचाता। ऐसे व्यक्ति तो जीवन भर पछताते हैं। मानव जीवन में कुछ करने की इच्छा हो तो अपने पाप का नाश करो। पुण्य कार्य करके मानव जीवन को धन्य करो। दिगंबर जैन पंचायत कमेटी ट्रस्ट के अध्यक्ष प्रमोद हिमांशु व पदाधिकारियों ने धर्मसभा के पूर्व आचार्यश्री विद्या सागर महाराज के चित्र का अनावरण एवं चित्र के समक्ष दीप प्रज्जवलित किए। ट्रस्ट के प्रवक्ता अंशुल जैन ने बताया कि मुनि प्रसाद, शैल, नकलंक सागर महाराज सान्निध्य में श्री आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर चौक में मूलनायक भगवान आदिनाथ का अभिषेक एवं संपूर्ण जगत के जीवों के कल्याण की भावना को लेकर मंत्रोचारित शांतिधारा की गई। भगवान जिनेन्द्र के अनंत गुणों की वंदना का अष्ट द्रव्य चढ़ाए।

Posted By: Nai Dunia News Network