भोपाल (मनोज तिवारी)। चुनावी साल में सरकार कर्मचारियों को साधने में लगी है, लेकिन हर दांव उल्टा पड़ रहा है। अध्यापकों का स्कूल शिक्षा, जनजातीय कार्य विभाग में संविलियन करने का फैसला क्या हुआ, अन्य कर्मचारी सरकार से नाराज हो गए। वे आरोप लगाते हैं कि सरकार अध्यापकों से लाड़ दिखा रही है और हमारी सुध तक नहीं ले रही। उधर, नई सेवा शर्तें और कैडर को लेकर अध्यापकों का उत्साह भी काफूर हो गया। नए कैडर में जाने के बाद पुराने लाभों से वंचित होने का खतरा देख अध्यापक कैडर बदलने के फैसले को वापस लेने की मांग कर रहे हैं।

सभी संवर्गों को मिलाकर प्रदेश में 15 लाख कर्मचारी हैं। सरकार का ध्यान इनमें से दो लाख 37 हजार अध्यापकों पर केंद्रित होकर रह गया है। पिछले ढाई साल में तीन बड़े फायदे देने के बाद भी सरकार ने अध्यापकों के स्कूल शिक्षा और जनजातीय कार्य विभाग में संविलियन का फैसला ले लिया। अन्य कर्मचारियों की ये बात नागवार गुजरी है और वे खुलकर सामने आने लगे हैं।

15 साल में नहीं बदल पाया पदनाम

वर्ष 1994 से 1998 के बीच भर्ती हुए 42 हजार सहायक शिक्षक 15 साल से सिर्फ पद उन्न्त करने की मांग कर रहे हैं, लेकिन सरकार अब तक फैसला नहीं ले पाई है। अध्यापकों के संविलियन का फैसला होने पर उनका गुस्सा भी फूट पड़ा। वे मंत्री से मिले आश्वासन पर चुप हैं, लेकिन जल्द ही आंदोलन की तैयारी भी चल रही है। उन्हें भी लग रहा है कि अभी नहीं तो कभी नहीं हो पाएगा।

आंदोलन की तैयारी में संविदा कर्मचारी

29 मई को कैबिनेट ने संविदा कर्मचारियों को भी नौकरी से नहीं निकाले जाने और नियमित कर्मचारियों को वेतनमान की 90 फीसदी राशि बतौर मानदेय देने की सौगात दी है। फिर भी संविदा कर्मचारी खुश नहीं हैं। वे प्रदेश में रिक्त पदों पर नियमित करने की मांग कर रहे हैं और उसे लेकर जल्द ही आंदोलन की रणनीति बना रहे हैं।

33 हजार लिपिक नाराज

पिछले साल कर्मचारी कल्याण समिति के अध्यक्ष रमेशचंद्र शर्मा की अध्यक्षता में लिपिकों की मांगों पर विचार करने के लिए मार्च 2016 में हाईपॉवर समिति बनी। समिति ने जुलाई 2017 में अपनी रिपोर्ट भी प्रस्तुत कर दी। इस पर अफसरों की समिति ने विचार भी कर लिया, लेकिन सरकार ने उनकी एक भी मांग पूरी नहीं की। उधर, चुनाव की नजदीकी को देखते हुए कर्मचारियों का उतावलापन बढ़ता जा रहा है। इसे देखते हुए लिपिक आंदोलन पर आमादा हैं। चरणबद्ध आंदोलन सितंबर 2017 से शुरू हो गया है। अब 11 जून से लिपिक आमरण अनशन पर बैठ रहे हैं।

वनकर्मी हड़ताल पर

उधर, प्रदेश के 33 हजार वन कर्मचारी हड़ताल पर चल रहे हैं। सरकार ने उन्हें डराने की भी कोशिश की, लेकिन वे हड़ताल से वापस लौटने को तैयार नहीं हैं। ये हालात इसलिए भी बने, क्योंकि कर्मचारियों की विभागीय मंत्री डॉ. गौरीशंकर शेजवार और फिर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से बात हो चुकी थी। उन्हें भरोसा दिलाया गया था कि 20 मई से पहले उनकी मांगों को लेकर फैसले लिए जाएंगे पर ऐसा नहीं हुआ। इतने पर भी यह कहा गया कि सरकार आंदोलन करने वालों को कुछ नहीं देगी।

फिर आंदोलन की तैयारी

हमारी मांग रिक्त पदों पर संविदा कर्मचारियों को नियमित करने की थी। सभी स्तर पर सहमति भी दिखाई जा रही थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सरकार ने कुछ राहत जरूर दी है, लेकिन छूटी हुई मांगों को लेकर फिर से आंदोलन करना ही पड़ेगा। उसकी हम तैयारी कर रहे हैं - रमेश राठौर, अध्यक्ष, मप्र संविदा अधिकारी-कर्मचारी महासंघ

कब तक इंतजार करें

हम चरणबद्ध आंदोलन कर रहे हैं। चौथे चरण में 11 जून से आमरण अनशन शुरू होना है। उसी की तैयारी में जुटे हैं। सरकार ने समिति बनाई है। समिति की अनुशंसाओं पर सहमति बनी, लेकिन अब तक कुछ नहीं दिया। अब कब तक इंतजार करें - सुधीर नायक, संरक्षण, मप्र लिपिक वर्गीय कर्मचारी संघ

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