Gujarat Assembly Election Result: धनंजय प्रताप सिंह, भोपाल। गुजरात विधानसभा चुनाव में आदिवासी वोट बैंक ने करवट ली तो एसटी वर्ग के लिए आरक्षित 90 प्रतिशत सीटें भाजपा की झोली में आ गईं। आमतौर पर आदिवासी वोट बैंक का रुझान एक जैसा ही रहता है इसलिए भाजपा को अगले वर्ष होने वाले मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और कर्नाटक के चुनाव से भी ऐसी ही उम्मीद है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में 2018 में भाजपा की हार की बड़ी वजह आदिवासी सीटों पर मिली पराजय भी मानी जाती है। ऐसे में गुजरात ने उम्मीदों को मजबूत किया है।

वर्ष 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव में जब आदिवासी वोट कांग्रेस के साथ गया था तो वहां की 27 एसटी आरक्षित सीटों में से कांग्रेस को 15 सीटें मिली थीं और भाजपा को नौ। यही मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में वर्ष 2018 के चुनाव में देखने को मिला। गुजरात में एसटी की सीटें कम होने पर भाजपा सत्ता बचाने में सफल रही थी जबकि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा को सत्ता गंवानी पड़ी थी।

अब 2022 में गुजरात में विधानसभा चुनाव के परिणामों में आदिवासी वोटों ने करवट ली तो परिणाम पलट गए। इस बार भाजपा को 23, कांग्रेस को मात्र तीन सीटें मिलीं, जबकि आम आदमी पार्टी को एक। राजनीतिक पंडित मानते हैं कि यही रुझान अब मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में 2023 में होने वाले विधानसभा चुनाव में देखने को मिल सकते हैं।

साथ ही अब यह यात्रा झारखंड सहित लोकसभा चुनाव में भाजपा को बढ़त दिलाएगी। इन राज्यों में भी आदिवासी वोट भाजपा को जा सकता है। गौरतलब है कि मप्र में 21.10 प्रतिशत, गुजरात में 15 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ में 30.62 प्रतिशत और राजस्थान में 13.48 प्रतिशत आदिवासी जनसंख्या है। लोकसभा में भी आदिवासियों के लिए 47 सीटें आरक्षित हैं।

दरअसल, भाजपा प्रदेश में अपना वोट शेयर 50 प्रतिशत पार ले जाने के लिए आदिवासी समुदायों को जोड़ रही है। प्रदेश में आदिवासी लगभग 23 प्रतिशत हैं। वर्ष 2003 के विधानसभा चुनाव में भाजपा का वोट शेयर 42.5 प्रतिशत, वर्ष 2008 में 37.6 प्रतिशत, वर्ष 2013 में 45.7 प्रतिशत एवं वर्ष 2018 में घटकर 41.5 प्रतिशत हो गया था। अब भाजपा का लक्ष्य आदिवासी वोट को भी दस प्रतिशत बढ़ाने का है। माना जा रहा है कि इन कोशिशों में पेसा कानून महत्वपूर्ण काम करेगा।

इधर, जय युवा आदिवासी शक्ति संगठन 'जयस" को लेकर भी भाजपा सतर्कता के साथ आगे बढ़ रही है। जयस ने कांग्रेस से हाथ मिलाने के बजाय अकेले ही करीब 100 सीटों पर चुनाव में उतरने के लिए ऐलान कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का अनुमान है कि जयस के अकेले मैदान में उतरने से भाजपा से अधिक नुकसान कांग्रेस का हो सकता है। गैर भाजपा वोट के बंटने का सीधा लाभ भाजपा को ही मिलेगा। यही स्थिति छत्तीसगढ़ में भी बन सकती है। छत्तीसगढ़ में सर्व आदिवासी समाज ने भानुप्रतापपुर में आदिवासी वोट के ध्रुवीकरण की कोशिश की है। ऐसे में भाजपा को फायदा मिल सकता है।

Posted By: Hemant Kumar Upadhyay

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