लाट साहब : कोरोना संक्रमण रोकने के लिए आधे-अधूरे शहर को बड़ा कंटेनमेंट क्षेत्र घोषित किया गया है। यहां संक्रमण रोकने के लिए किए जा रहे तमाम इंतजाम, रियायत एक नाटक की तरह ही नजर आ रहे हैं। इसके पीछे तर्क यह है कि जब यहां लोगों को घर से बाहर निकलने में भी मनाही थी, तो फिर इसे सख्ती से लागू किया जाना चाहिए। आलम यह है कि हल्की रियायत मिलने पर यहां हर गली में जाम की स्थिति बन गई। ऐसे में क्या संक्रमण रुकेगा? इसका जवाब है नहीं, इससे संक्रमण और बढ़ेगा। भीड़ सड़क पर ऐसी निकली कि सर्वधर्म से लेकर कोलार थाने तक सिर्फ वाहन ही वाहन दिखाई दे रहे थे। आलम यह है कि जिले के साहबों के ये आधे-अधूरे प्रयास के बीच नाटक पूरे किए जा रहे है। अब तो इन साहबों को भी समझ नहीं आ रहा है कि करें तो आखिर क्या करें।

बढ़ती मौतों की संख्या पर खामोशी

राजधानी में हर दिन कोरोना संक्रमित मरीजों की मौत हो रही है। यह संख्या एक, दो या 10 नहीं, बल्कि पिछले कई दिनों से 40 से ऊपर बनी हुई है। बीते एक सप्ताह में ही शहर में 250 से अधिक मौत हो चुकी है, लेकिन प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की नाकामी कहें या लापरवाही कि हर दिन एक, दो या तीन मौत भी कोरोना से होना बताया जा रहा है। वह व्यक्ति भी धन्य है जिसकी कोरोना से मौत की अधिकारिक पुष्टि सरकार कर रही है। लेकिन श्मशान घाटों में उठा मौत का सैलाब कुछ और ही बयां कर रहा है। इतना सब कुछ होने के बावजूद सरकार के नुमाइंदे खमोश हैं और कुछ भी बोलने से बच रहे हैं। अस्पतालों में बिस्तर की कमी है। निजी अस्पतालों में अंधेरगर्दी मची हुई है, लेकिन इन सब के बीच एक अजीब सी खमोशी है और गलियों में एंबुलेंस की आवाजें सुनाई दे रही हैं।

ये कैसी पाबंदी

शहर में जिला प्रशासन रेमडेसिविर इंजेक्शन को लेकर काफी सख्त दिखाई दे रहा है, लेकिन इसके पीछे की सत्यता कुछ और ही है। पहले तो आम जनता को आसानी से यह इंजेक्शन उपलब्ध हो रहे थे, लेकिन जैसे ही पाबंदी लगी, लोगों ने इंजेक्शन को स्टॉक करना शुरू कर दिया। यह वह इंजेक्शन है, जो निमोनिया होने पर लोगों को लगाया जाता था और कोई पूछता भी नहीं था। लेकिन आज स्थिति यह है कि इंजेक्शन मुंहमांगी कीमत पर बिक रहा है। राजधानी के एक बड़े अस्पताल में जब इंजेक्शन के लिए पूछा गया तो पता चला कि वहां कोई इंजेक्शन नहीं बचा है, बल्कि मंगवाए गए हैं। जबकि इसी अस्पताल से जब पीछे के दरवाजे मुंहमांगी कीमत देने का वादा किया तो इसी अस्पताल की पार्किंग में यह इंजेक्शन उपलब्ध हो गए। इसका मतलब सीधा-सा है कि अस्पतालों ने ही कालाबाजारी के द्वार खोल रखे हैं।

किसी का गुस्सा किसी पर उतारा

यूं तो हर अधिकारी की तमन्‍ना होती है कि वह प्रदेश की राजधानी में रहे, लेकिन इसमें से कुछ अफसर ऐसे भी होते हैं, जिनकी क्षमता तो कम होती है, लेकिन जुगाड़ लगाकर आ ही जाते हैं। ऐसा ही वाकया विगत दिनों जिला प्रशासन में भी हुआ। यहां हाल ही में जुगाड़ से आए एक प्रशिक्षु अफसर ने सारे दफ्तर में तूफान मचाया हुआ है। इस अफसर को छोटी-छोटी बातों पर इतना गुस्सा आता है कि वे कर्मचारियों के साथ-साथ अन्य लोगों से भी बुरा बर्ताव करने से बाज नहीं आ रहे हैं। आलम यह है कि विगत दिनों इनके अधीनस्‍थ कर्मचारी से मिलने पहुंचे एक व्यक्ति पर इस अफसर ने पूरा गुस्सा निकाल दिया, जबकि संबंधित व्यक्ति अफसर से मिलने ही नहीं गया था। काम की अधिकता का दबाव सब पर होता है, लेकिन सफल वही अधिकारी होता है जो इसका प्रबंधन बेहतर तरीके से कर लेता है।

Posted By: Ravindra Soni

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