भोपाल(नवदुनिया रिपोर्टर)। भारत में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की लगातार उपेक्षा हो रही है, इसी कारण अंग्रेजी के बढ़ने के साथ ही अंग्रेजियत भी लगातार भारतीयता को समाप्त कर रही है। नई शिक्षा नीति को पूर्ण मनोयोग से लागू किया जाए तो स्थिति बदल सकती है। यह विचार ओसाका विश्वविद्यालय जापान के पूर्व हिंदी प्रोफेसर डॉ. तोमिओ मिजोकामि ने हिंदी भवन में भाषा विमर्श पर आधारित ई-संगोष्ठी में व्यक्त किए।

कार्यक्रम सचिवालय, केंद्रीय हिंदी संस्थान और वैश्विक हिंदी परिवार की ओर से आयोजित किया गया था। ई-संगोष्ठी का द्वितीय सत्र भाषा विमर्श पर आधारित रहा, जिसमें पद्मश्री से सम्मानित डॉ. तोमियो मिजोकामी का विशेष साक्षात्कार हिंदी भवन के निदेशक डॉ. जवाहर कर्णावट ने लिया। डॉ. तोमियो मिजोकामी, जापान में हिंदी के अग्रणी सेवक के रूप में ख्यात हैं। उन्होंने भारत में हाल में लागू की गई नई शिक्षा नीति पर पूछे गए प्रश्न के उत्तर में प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में दिए जाने की बात का समर्थन किया। उन्होंने बताया कि जापान के कुल 27 नोबेल पुरस्कार विजेता जापानी माध्यम से ही पढ़कर ही वहां तक पहुंचे हैं। सत्र में हिंदी संस्थान के उपाध्यक्ष अनिल जोशी, वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव,पद्मेश गुप्त (यूके), अनूप भार्गव (यूएसए) की भी सहभागिता रही। इससे पहले पहला सत्र प्रौद्योगिकी पर आधारित रहा, जिसमें माइक्रोसॉफ्ट के निदेशक बालेंदु शर्मा 'दाधीच' ने अपने व्याख्यान में 'यूनिकोड फोंट में प्रकाशन' विषय पर व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत किए। विविध उदाहरणों के माध्यम से उन्होंने प्रकाशन उद्योग में यूनिकोड से जुड़े व्याप्त भ्रम को समाप्त करने का प्रयास किया। उन्होंने अपने व्याख्यान में यूनिकोड से दूरी को प्रकाशन उद्योग के लिए श्रम एवं धन का अपव्यय बताया।

Posted By: Nai Dunia News Network

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