वैभव श्रीधर, भोपाल नईदुनिया। हनीट्रैप मामले से मध्य प्रदेश में एनजीओ एक बार फिर सुर्खियों में हैं। दरअसल, इस पूरे खेल को अंजाम देने के लिए एनजीओ को सीढ़ी बनाकर इस्तेमाल किया गया। यह पहला मौका नहीं है, जब एनजीओ की भूमिका पर सवाल उठे हों। 2009 में मुख्यमंत्री निवास पर हुई गैर सरकारी संगठनों की पंचायत में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एनजीओ की पड़ताल करने, ग्रेडिंग कर अधिमान्यता देने की घोषणा की थी, लेकिन यह कभी परवान ही नहीं चढ़ी।

2015 में राज्य सूचना आयोग ने एनजीओ की जानकारी विभाग की वेबसाइट पर सार्वजनिक करने का आदेश दिया था, लेकिन उसे भी नहीं माना गया। यही वजह है कि नेताओं और अफसरों तक पहुंच रखने वाले एनजीओ का खेल चलता रहा और उसका नतीजा सामने है।

सूत्रों के मुताबिक, एनजीओ को लेकर प्रदेश में मनमर्जी से काम देने के आरोप नेताओं और अधिकारियों पर लगते रहे हैं। इसे लेकर पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग, महिला एवं बाल विकास आदि में शिकायतें होती रहीं, लेकिन एनजीओ संचालकों के रसूख के आगे किसी की नहीं चली। यही वजह है कि शिवराज सरकार ने अक्टूबर 2009 में जन अभियान परिषद के माध्यम से एनजीओ की ग्रेडिंग कराकर अधिमान्यता देने का जो एलान किया था, उस पर अमल ही नहीं हुआ।

वर्ष 2012 में तत्कालीन वित्त मंत्री राघवजी की अध्यक्षता में कमेटी बनी और नियम भी तैयार हो गए। इसमें प्रावधान रखा गया कि एनजीओ को अधिमान्यता एकमुश्त तीन साल के लिए दी जाएगी। संस्था का तीन स्तर पर परीक्षण होगा, वो जिस क्षेत्र में काम करने का दावा करेगी, उसकी जांच की जाएगी। दानदाताओं से राशि मिलने की बात सामने आने पर संबंधितों से बात की जाएगी।

संस्था के काम का भौतिक सत्यापन कराने के साथ स्व-मूल्यांकन का जो प्रपत्र एनजीओ देता, उसका विशेषज्ञ परीक्षण करेंगे। विस्तृत परीक्षण के बाद संस्थाओं की ए से लेकर डी तक ग्रेडिंग होती और अधिमान्यता प्राप्त एनजीओ की सूची परिषद की वेबसाइट पर भी रहती, लेकिन यह काम नहीं हुआ। बताया जा रहा है कि नेता और अधिकारी नहीं चाहते कि एनजीओ के क्षेत्र में पारदर्शिता आए। यदि ऐसा हो जाता तो 'चहेतों" को उपकृत करने का खेल बंद हो जाता। परिषद के कार्यपालक निदेशक जितेंद्र राजे ने भी माना कि एनजीओ की ग्रेडिंग और अधिमान्यता का काम पूरा नहीं हुआ।

87 हजार में 27 हजार एनजीओ ही कर रहे काम

जन अभियान परिषद ने शुरुआती दौर में सर्वे करवाया था। इसमें पता चला था कि प्रदेश में 87 हजार पंजीकृत गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) हैं। इनमें से 27 हजार ही क्रियाशील (वर्किंग) हैं। कई संस्थाओं के रिकॉर्ड में पते गलत दर्ज हैं तो कई सिर्फ कागज पर हैं। कई संगठनों ने तो नियमानुसार रजिस्ट्रार फर्म्स एंड सोसायटी में ऑडिट रिपोर्ट तक जमा नहीं की।

सूचना आयोग का आदेश नहीं माना

13 मई 2015 को सूचना का अधिकार कार्यकर्ता अजय दुबे की याचिका पर मुख्य सूचना आयुक्त केडी खान ने मुख्य सचिव को निर्देश दिए थे कि जिन एनजीओ को शासन से अनुदान मिलता है, उनकी जानकारी विभाग की वेबसाइट पर प्रदर्शित की जाए। दरअसल, अपील में कहा गया था कि जिन एनजीओ को 50 हजार रुपए से ज्यादा आर्थिक सहायता मिलती है, उनको सूचना का अधिकार कानून का क्रियान्वयन करना अनिवार्य है। इस पर भी अमल नहीं हुआ।

कोई नहीं रोकना चाहता एनजीओ की गड़बड़ी: शर्मा

पूर्व मुख्य सचिव केएस शर्मा का कहना है कि एनजीओ के नाम पर धन की बर्बादी हो रही है। राज्य स्तर पर काम करने वाले संगठन का काम जनसेवा नहीं, बल्कि इसका आवरण ओढ़कर खुद की कमाई करना है। लोग एनजीओ से कमाई के साथ-साथ पॉवर का उपयोग करते हैं, क्योंकि इसके कारण नेताओं और अधिकारियों से संपर्क हो जाता है। कोई भी इस गड़बड़ी को रोकना नहीं चाहता है। राजनेता हो या अफसर, सबके अपने-अपने स्वार्थ हैं। राजनेताओं को कोई काम करवाना होता है तो वो एनजीओ के माध्यम से बड़ी आसानी से हो जाता है।

ब्यूरोक्रेट की पत्नियां, परिजन और कुछ अधिकारी सेवानिवृत्ति के बाद एनजीओ बना लेते हैं। अभी एक मामला (हनीट्रैप) हुआ है। इसके पीछे कौन लोग हैं, उनके नाम सामने आने चाहिए, ताकि पता लगे कि किस तरह के लोग एनजीओ को मदद करते हैं। सरकार को ऐसे संगठनों को दी जा रही मदद पर रोक लगाकर नियंत्रण और निगरानी की पुख्ता व्यवस्था बनानी चाहिए।

Posted By: Prashant Pandey