गुरुजी : वैसे तो शिक्षकों का स्थान भगवान से भी ऊपर है, लेकिन कभी-कभी लगता है कि ये हर काम में पूरे से जरा से कम रह जाते हैं। तभी तो कोरोना महामारी के दौरान कई तरह की जिम्मेदारी निभाने के बाद भी ये कोरोना योद्धा बनने से पीछे रह गए। कोरोना की पहली लहर में बिना पीपीई किट के सैंपलिंग कराने की जिम्मेदारी संभालने वाले इन कर्मवीरों को अब टीकाकरण की महती जिम्मेदारी सौंपी गई है। स्कूल शिक्षा विभाग के आदेश में कहा गया है कि ये स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के घर जाकर उन्हें जागरूक करें और उनके माता-पिता को टीकाकरण केंद्र पर ले जाकर टीका लगवाएं, जबकि इन दिनों जिले में 60 से अधिक शिक्षक कोरोना पॉजिटिव हैं और कोरोना का कहर भी काफी तेज हो गया है। ऐसे में शिक्षकों में डर भी हैं, लेकिन इतना तय है कि ये अपने कर्मपथ से पीछे नहीं हटेंगे।

कोरोना ने कर दिया लाचार

एक तकनीकी विश्वविद्यालय के कुलपति इन दिनों कोरोना संक्रमित हैं। उनका कार्यकाल जून में खत्म हो रहा है। इससे पहले इन्होंने करोड़ों स्र्पये खर्च कर सार्थक एजुविजन कार्यक्रम करा दिए, ताकि इन पर सरकार की नजर बनी रहे। कार्यक्रम में देशभर के कुलपतियों को बुलाकर उन्होंने अपनी धाक भी जमा ली। इसी कार्यक्रम में एक अन्य विश्वविद्यालय के कुलपति भी मंत्रियों की आवभगत में लगे रहे, क्योंकि उनका कार्यकाल भी सितंबर में खत्म होने वाला है। ऐसे में वे भी राजभवन और मंत्रियों के चक्कर काट रहे थे। अब कोरोना की दूसरी लहर ने इन्हें लाचार कर दिया है। एक-एक कर सभी विश्वविद्यालय के कुलपतियों ने इतने चक्कर काट लिए कि संक्रमित होने लगे। अब कोरोना से बेबस होकर ये न तो राजभवन के चक्कर काट पा रहे हैं और न ही नेताओं की चापलूसी कर पा रहे हैं। अब देखना यह है कि पुरानी मेहनत कितना रंग लाती है।

चापलूसी में आगे निकले प्रो. सिंह

कांग्रेस सरकार में उच्च शिक्षा विभाग में अपना सिक्का जमाने वाले प्रोफेसर सिंह अब भाजपा सरकार में भी अपना गुणगान कर रहे हैं। उन्हें दो माह पहले निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग से बाहर कर गीतांजलि कॉलेज भेजा गया था। हालांकि आयोग में अफसरी की आदत से मजबूर सिंह प्रमुख सचिव (पीएस) की चापलूसी कर बेनजीर कॉलेज पहुंच गए। यहां भी चॉक-डस्टर में मन नहीं रमा तो फिर से चापलूसी में लग गए। प्रो सिंह ओएसडी बनकर धाक जमाने की इच्छा रखते थे, लेकिन विभाग में पद खाली नहीं होने के कारण पीएस ने उन्हें एक ओएसडी के साथ अटैच कर दिया। अब पद से अटैच होते ही उन्होंने कॉलेजों के प्राचार्यों पर अपना रौब जमाना शुरू कर दिया है। चौंकाने वाली बात यह है कि विभागीय मंत्री को प्रोफेसर सिंह का तमाशा ही नहीं मालूम। उनकी नाक के नीचे ही कोई प्रोफेसर तीन माह में कहां से कहां तक पहुंच गया।

ड्यूटी से हैरान-परेशान डीपीसी

जिला शिक्षा केंद्र के जिला परियोजना समन्वयक (डीपीसी) इन दिनों हैरान-परेशान हैं। ऐसा लगता है कि जब से वह डीपीसी बने हैं, तब से उनका सुकून छिन गया है। या यूं कहें कि उन्हें किसी की नजर लग गई है। तभी तो डीपीसी बनते ही दो बार कोरोना पॉजिटिव हुए और दो से तीन माह छुट्टी पर ही रहे। छुट्टी से लौटे तो अधिकारी आरटीई को लेकर फाइल मांगने लगे। उन्होंने जैसे-तैसे अधिकारियों से साठ-गांठ बनाई ही थी कि उनकी ड्यूटी कोरोना वैक्सीनेशन सेंटर पर लगा दी गई। अब बेचारे सुबह 10 से रात 8 बजे तक सेंटरों पर घूमते रहते हैं। यही कारण है कि शिक्षकों के लिए भी वे ऊटपटांग निर्देश निकाल देते हैं। शिक्षकों को बच्चों के अभिभावकों को वैक्सीनेशन सेंटर पर पहुंचाने का निर्देश भी इन्हीं में से एक है। ऐसे में अधिकारियों के साथ उन्हें शिक्षकों की बेरुखी भी झेलनी पड़ रही है।

Posted By: Ravindra Soni

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