Madhya Pradesh BJP: धनंजय प्रताप सिंह, भोपाल। दमोह उपचुनाव के नतीजे की समीक्षा कर रही भाजपा चिंतन की मुद्रा में है। सत्ता में मौजूदगी और मजबूत संगठन रहते हुए उसके तीन दशक पुराने किले में ढाई साल के दौरान दूसरी हार को शीर्ष नेतृत्व गंभीर संकेत मान रहा है। पार्टी ने कांग्रेस से आए राहुल लोधी को मौका दिया था, जो 2018 के विस चुनाव में बतौर कांग्रेस प्रत्याशी यहां भाजपा को मात दे चुके थे। लोधी की हार को दलबदल के खिलाफ जनमत माना जा रहा है तो खुद भाजपा में भितरघात का परिणाम, वहीं संगठन के लिहाज से कांग्रेस से मिलती नई चुनौती भी। चूंकि अब झाबुआ लोकसभा सीट सहित विस की कुछ सीटों पर उपचुनाव और स्थानीय निकाय के चुनाव होने हैं, तो भाजपा अब नए सिरे से जनता की नब्ज टटोलने और संगठन में असंतोष को भांपकर समय रहते विकल्प पर विचार की तरफ फोकस करेगी।

दमोह में भाजपा सत्ता से लेकर संगठन तक कांग्रेस के मुकाबले मजबूती से उतरी थी। सरकार के मंत्रियों की मौजूदगी बनी रही, वहीं संगठन के दिग्गजों ने पूरे उपचुनाव क्षेत्र में डेरा डाल रखा था, लेकिन भितरघात के जो आरोप परिणाम आने के बाद सतह पर आए, उसे मतदान के पूर्व भांपने में चूक हो गई। अब मंथन जारी है कि वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में यदि स्थानीय स्तर पर भितरघात हुआ भी तो उसकी भरपाई किसी विकल्प से पहले ही हो जानी थी, लेकिन इस पर ध्यान नहीं दिया गया।

संगठन को लेकर भी चिंतन जारी है कि जब कांग्रेस के मुकाबले भाजपा का संगठन वार्ड स्तर तक मजबूत माना जाता है, तो दमोह में इसका असर क्यों नहीं दिखा? दमोह लंबे समय तक भाजपा का मजबूत किला रहा है, तो संगठन जीती बाजी कैसे अपने पक्ष में नहीं कर सका, जैसा बीते वर्ष 28 सीटों के उपचुनाव में 18 पर जीत के रूप में दर्ज किया गया था। ऐसे में संगठन में भी कसावट पर नए सिरे से चिंतन किया जा रहा है।

दमोह की हार के सियासी मायने

भाजपा के लिए दमोह की हार महज एक सीट गंवाना नहीं है, बल्कि अपने मजबूत गढ़ में लगातार दूसरी मात है, जो सियासी जमीन कमजोर होने के संकेत करता है। यहां पार्टी का चेहरा रहे पूर्व वित्त मंत्री जयंत मलैया 1984 के उपचुनाव में यहां पहली बार जीत दर्ज कर सातवीं विस मेें पहुंचे थे। इसके बाद 1990, 93 और 98 में क्रमश: 9वीं, 10वीं और 11वीं विस में पहुंचे।

2003 में पांचवीं बार दमोह से निर्वाचित हुए और 2004 में उमा सरकार, फिर बाबूलाल और शिवराज सिंह चौहान की सरकारों में भी मंत्री बने। 2008 और 13 में भी दमोह से जीतकर सरकार में मंत्री बने, लेकिन 2018 में कांटेदार मुकाबले में कांग्रेस से राहुल लोधी ने महज 798 वोटों से मलैया को मात दे दी। मलैया और फिर लोधी की हार से दमोह में भाजपा की जमीन खिसकने के संकेत मिल रहे हैं, वहीं दोनों बार कांग्रेस की जीत ने संगठन की चिंता बढ़ा दी है।

इनका कहना

दमोह विधानसभा चुनाव में जीत के लिए भाजपा ने अपनी युक्तियुक्त ताकत लगाई थी। परिणाम अपेक्षित नहीं रहे। पार्टी सभी पक्षों से फीडबैक ले रही है। नेतृत्व भितरघात के आरोपों की सधााई भी देखेगा। समीक्षा के उपरांत ही जरूरी निर्णय लिए जाएंगे। यह पार्टी की आंतरिक प्रक्रिया का हिस्सा है।

- रजनीश अग्रवाल, प्रदेश मंत्री, भाजपा

Posted By: Hemant Kumar Upadhyay

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