रुचि एस.काशिव, भोपाल। Madhya Pradesh Budget 2019 : भोपाली बटुओं को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने के लिए राज्य सरकार ने बजट में प्रावधान किया है, लेकिन सच्चाई इसके उलट है। कड़वी सच्चाई यह है कि मैदानी स्तर पर भोपाली बटुओं को तैयार करने करने वाले कारीगर ही नहीं बचे है। स्थानीय स्तर पर बटुए तैयार करने वाले न तो कारीगर है, न ही उनके काम कोई तवज्जो दी जा रही है। इसी मसले पर भोपाली बटुए की कहानी सुनाते हैं सुनील जे पारेख। सुनील वे व्यक्ति है, जिनका परिवार यह काम पिछले 200 सालों से कर रहा है। हमारी दुकान पुराने भोपाल में 185 साल पहले खुली, जिसका नाम था 'पारेख बिरादर' समय के साथ यह नाम 'पारेख ब्रदर्स' हो गया है, लेकिन आज यह स्थिति है कि शहर में पारंपरिक भोपाली बटुए तैयार करने वाले कारीगर नहीं बचे है। लोग मशीन से तैयार कर के भोपाली बटुए बना कर बेच रहे हैं, जबकि असली बटुए हाथ से तैयार किए जाते थे, जिस पर सोने-चांदी के तारों से लेकर आज के समय की जरी-जरदोजी तक का उपयोग किया जाता है।

किमखाब पर तैयार होता था बटुआ

वे कहते हैं कि मुझे याद आता है जहां तक नवाब कुदसिया बेगम हमारे पुरखों को एक नायाब कपड़ा देती थी, जिसे गौरैया चिड़िया बुनती थी। उसकी बुनावट घोंसले की तरह होती थी। उस कपड़े को 'किमखाब' कपड़ा कहते थे। उस कपड़े पर हमारे पुरखे हीरे, मोती, नायाब रत्नों के साथ सोने और चांदी के तारों के साथ काम कराती थीं। वे अपने मेहमानों को उपहार में देने के लिए यह बटुए तैयार करती थी। इसके अलावा वे जब हज जाती तो भी यही बटुए साथ ले जातीं, इस तरह से धीरे-धीरे यह बटुए बहुत प्रसिद्ध होने लगे।

आमजनों की भी पसंद बन गया बटुआ

इसके बाद आमजनों के बीच भी इन बटुओं की डिमांड होने लगी। तब यह बटुए सिल्क, टसर, सॉटिन आदि कपड़े पर जरी-जरदोजी, पोलका आदि में तैयार किए जाने लगे। मोती काम भी बटुओं पर किया जाने लगा, जिन्हें बीड वर्क कहा जाता था। इनकी कीमत के विषय में सीधे तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता, इन पर किया गया काम ही कीमत तय करता है। दुबई के शेख और पाकिस्तान के लोगों ने भी हमने भोपाली बटुए ऑर्डर पर बनवाए है। हमारे परिवार ने 50 परिवार तैयार किए, जो पारंपरिक काम करें, जिसमें से अब 10-12 परिवार ही बचे हैं जो यह विधा बचाने का काम कर रहे है। अब मेरा बेटा कान्हा जे. पारेख यह काम कर रहा है।

कारीगरों को नहीं पहुंचा कोई फायदा

देशभर की टेक्सटाइल और डिजाइनिंग यूनिवसिर्टी के छात्र हमारे यहां जरी-जरदोजी और भोपाली बटुओं का काम सीखने आते हैं। हमने कई छात्रों को इसकी टे्रनिंग दी है ताकि हम इस विधा का बचा सकें। आजकल लोग हाथ से तैयार सामान को उतनी अहमियत नहीं देते, जितनी की मशीन से तैयार सामान को। जबकि बटुआ तैयार करने में कारीगर की हथेली तक छलनी हो जाती है। अंगुलियों से खून तक निकल आता है। हम 350-से 400 रुपए का बटुआ बेचें तो हमें तो 200 रुपए की लागत तक नहीं मिलती। सरकार ने लघु उद्योग, हस्तशिल्प हथकरघा की स्थापना की, लेकिन इससे भी कारीगरों को कोई फायदा नहीं पहुंचा।