- संजय मिश्र

मध्य प्रदेश इन दिनों चुनाव के रंग में रंगा हुआ है। लगभग आठ साल बाद पंचायत और नगरीय निकाय चुनाव हो रहे हैं। भाजपा एवं कांग्रेस जहां आमने-सामने की लडाई में हैं, वहीं अनेक सीटों पर बसपा, आप, एआइएमआइएम सहित कई राजनीतिक दल त्रिकोण बनाने का प्रयास कर रहे हैं। राज्‍य की मुख्‍यधारा की राजनीतिक पार्टियां भाजपा एवं कांग्रेस ने पूरा जोर लगा दिया है। वे इसे 2023 के विधानसभा चुनाव का पूर्वाभ्‍यास मानकर लड रही हैं। चुनावी माहौल में विधानसभा चुनाव के पूर्व के शक्ति प्रदर्शन की ध्‍वनि गूंज साफ सुनाई दे रही है। मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जहां भाजपा प्रत्‍याशियों के लिए जमकर सभाएं, रैलियां कर रहे हैं वहीं कांग्रेस प्रत्‍याशियों के लिए पूर्व मुख्‍यमंत्री कमल नाथ ने भी कोई कसर नहीं छोडी है।

प्रदेश के नगरीय क्षेत्रों में भाजपा का प्रभुत्व रहा है। दिसंबर 2014 में हुए चुनाव में सभी 16 नगर निगमों में भाजपा के ही महापौर चुने गए थे। नगर पालिकाओं और नगर परिषदों के ज्यादातर अध्यक्ष भी भाजपा के ही रहे हैं। वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव के बाद जब कांग्रेस सत्‍ता में आई तो कमल नाथ सरकार ने सुनियोजित तरीके से नगरीय निकायों में नगर पालिक विधि में संशोधन करके महापौर एवं निकायों के अध्‍यक्ष का चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली से कराने का प्रविधान कर दिया। इसमें महापौर और अध्यक्ष का चुनाव सीधे जनता की जगह पार्षदों के माध्यम से कराने की व्यवस्था बनाई गई थी। मकसद साफ था कि जनता पार्षद चुनेगी और फिर पार्षदों में से कोई महापौर और अध्यक्ष बनेगा। इसमें जोड़-तोड़ के जरिये सरकार अपनी पसंद का महापौर बनाने में सफल हो सकती थी। भाजपा ने कांग्रेस की मंशा को समझ लिया और इसका पुरजोर विरोध किया। उसने तत्कालीन राज्यपाल लालजी टंडन से मिलकर इसे लोकतंत्र के लिए अनुचित मानते हुए अनुरोध किया कि अध्यादेश को अनुमति न दें। संविधानिक व्यवस्था के चलते ऐसा नहीं हो पाया और राज्‍यपाल ने सरकार के प्रस्‍ताव को अनुमति दे दी। बाद में कानूनी अडचनों के कारण समय पर चुनाव नहीं हो पाए। मार्च 2020 में सत्ता परिवर्तन के बाद शिवराज सरकार ने कांग्रेस सरकार द्वारा बनाए गए अधिनियम में संशोधन के लिए विधेयक का प्रारूप तैयार कराया। इसे विधानसभा में प्रस्तुत भी कर दिया लेकिन समयपूर्व सत्रावसान होने के कारण यह पारित नहीं हो सका। इस तरह कांग्रेस सरकार के समय लागू की गई अप्रत्यक्ष चुनाव की प्रणाली प्रभावी रही। हालांकि निकायों में आरक्षण मामला सुप्रीम कोर्ट में चले जाने के कारण चुनाव कानूनी अड़चनों में फंस गया।

इस वर्ष मई माह में जब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद नगरीय निकाय और पंचायत चुनाव का रास्ता साफ हो गया तो आनन-फानन में शिवराज सरकार ने अध्यादेश के माध्यम से महापौर का चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली यानी सीधे जनता के माध्यम से कराने की व्यवस्था लागू कर दी। नगर पालिका और नगर परिषद के अध्यक्ष जरूर पुरानी व्यवस्था यानी पार्षदों के माध्यम से ही चुने जाएंगे। विधानसभा चुनाव के पूर्व हो रहे इन चुनाव की महत्ता को देखते हुए भाजपा विशेष एहतियात बरत रही है। टिकट वितरण में नए चेहरों को प्राथमिकता देकर उसने साफ संदेश दिया कि परिवारवाद नहीं चलेगा और पीढ़ी परिवर्तन का सिलसिला आगे भी चलता रहेगा। जिन प्रत्याशियों के परिजनों की आपराधिक पृष्ठभूमि की जानकारी बात में लगी उनके टिकट मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने संगठन पदाधिकारियों से बात करके कटवा दिए। इंदौर में एक और भोपाल में दो ऐसे प्रत्याशियों के टिकट काटे गए जिन्‍हें स्‍थानीय मंत्रियों एवं विधायकों की पैरवी पर प्रत्‍याशी बनाया गया था। मुख्यमंत्री ने संदेश दे दिया कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों को किसी भी स्थिति में आगे नहीं बढ़ाया जाएगा। इस प्रयोग के परिणाम जो भी आएं लेकिन जनता और कार्यकर्ताओं के बीच इसका अच्‍छा संदेश गया है।

निकाय एवं पंचायत चुनाव भले ही स्थानीय हों पर इनका महत्व कितना है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है दोनों दलों के वरिष्ठ नेता जीजान से जुटे हैं। वे किनारे रहकर कोई जोखिम लेना नहीं चाहते। कमल नाथ ने तो विधायकों और विधानसभा चुनाव का टिकट चाहने वालों से साफ कह दिया है कि निकाय चुनाव के परिणाम के आधार पर उनका रिपोर्ट कार्ड बनेगा। इसके आधार ही तय होगा कि विधायकों का टिकट बरकरार रहेगा या नहीं। यही कारण है कि विधायक अपने-अपने क्षेत्र में पूरी ताकत से प्रत्याशी के साथ खड़े हैं। हालांकि कई जगह बागी प्रत्याशी दोनों दलों के लिए परेशानी का सबब बने हुए हैं। अभी भी मान-मनौवल का दौर चल रहा है। निकाय चुनाव के मतदान में अभी कुछ दिन शेष हैं लेकिन पंचायतों के पहले चरण का चुनाव हो चुका है। जिन पंचायतों में मतदान कराया गया वहां मतगणना भी हो चुकी है। उनके जो परिणाम आए हैं वे कई बडे नेताओं की मुश्किल बढाने वाले हैं। भाजपा और कांग्रेस के कई धुरंधर नेता कडी मेहनत के बाद भी अपनों को जिता नहीं सके। रीवा में विधानसभा अध्यक्ष गिरीश गौतम के पुत्र, नरसिंहपुर में मंत्री विजय शाह की बहन, बड़वानी के सेंधवा से कांग्रेस विधायक ग्यारसीलाल रावत की पत्नी एवं बेटा, बुरहानपुर से निर्दलीय विधायक सुरेंद्र सिंह की बेटी-बहू चुनाव हार चुके हैं। जाहिर है, इन नेताओं की साख को लेकर इनके दलों में भी चर्चा शुरू होगी।

Posted By: Ravindra Soni

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