भोपाल (नईदुनिया स्टेट ब्यूरो)। Madhya Pradesh News प्रदेश के अधिकारियों और कर्मचारियों की पदोन्नति में किसी भी पार्टी (भाजपा और कांग्रेस) की रुचि नहीं है। तभी तो दोनों पार्टियों ने शासन कर लिया, लेकिन कर्मचारियों के भाग्य का फैसला नहीं हो पाया। सुप्रीम कोर्ट में लंबित पदोन्नति में आरक्षण मामले में संविधान पीठ के फैसले के बाद नियमित सुनवाई तक नहीं हो पा रही है।

वहीं, सरकारें यह तो कहती रहीं कि कोर्ट में अर्जी लगाकर सशर्त पदोन्नति देने की कोशिश की जा रही है, लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ। शिवराज के बाद कमल नाथ सरकार आ गई और फिर से शिवराज सरकार ने कार्यभार संभाल लिया, लेकिन कर्मचारियों की चिंता किसी ने नहीं की।

तभी तो करीब 35 हजार कर्मचारी दो साल पहले और अब हर माह करीब पांच सौ कर्मचारी बगैर पदोन्नति सेवानिवृत्त होने के लिए मजबूर हैं। विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस और भाजपा ने भरोसा दिलाया था कि सुप्रीम कोर्ट से मंजूरी लेकर कर्मचारियों को सशर्त पदोन्नति देने के रास्ते खोले जाएंगे।

कर्मचारी आज तक इसी भरोसे में बैठे हैं। न तो विधानसभा चुनाव से पहले शिवराज सरकार ने इस पर गंभीरता से काम किया और न ही कमल नाथ सरकार ने। अब जबकि भाजपा ने फिर से सत्ता संभाली है। कर्मचारियों को उम्मीद थी कि उन्हें बगैर पदोन्नति सेवानिवृत्त नहीं होना पड़ेगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। दो साल आयुसीमा बढ़ाने की अवधि 31 मार्च को पूरी हो गई है और एक अप्रैल को करीब डेढ़ हजार कर्मचारी सेवानिवृत्त हो गए।

इनमें से करीब साढ़े चार सौ कर्मचारी बगैर पदोन्नति सेवानिवृत्त हुए हैं। वहीं अब लगातार हर साल सात से आठ सौ कर्मचारी सेवानिवृत्त होने हैं। इनमें से लगभग 50 फीसदी बगैर पदोन्नति सेवानिवृत्त होंगे। पुरानों को हटाने और नई नियुक्ति में निकाल दिया वक्त कमल नाथ सरकार ने पदोन्न्ति में आरक्षण मामले से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के वकीलों की पैनल और मंत्रालय में बैठे अधिकारियों को हटाने और नए वकीलों व अधिकारियों की नियुक्ति में पूरा समय निकाल दिया।

सरकार ने बीच में कोर्ट में सशर्त पदोन्नति देने की अर्जी लगाने को कहा भी, लेकिन 15 महीनों में सरकार कुछ नहीं कर पाई और सत्ता में लौटी भाजपा सरकार की प्राथमिकता में भी अभी कर्मचारी नहीं दिखाई दे रहे हैं। सितंबर में आया था फैसला मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने 30 अप्रैल 2016 को 'मप्र लोक सेवा (पदोन्नति) नियम 200 शर्तें खारिज कर दिया था।

इसके खिलाफ तत्कालीन शिवराज सरकार सुप्रीम कोर्ट चली गई। प्रकरण की सुनवाई के दौरान वर्ष 2006 में आए एम. नागराजन मामले के फैसले पर पुनर्विचार की मांग उठी और मामला संविधान पीठ को चला गया। संविधान पीठ भी सितंबर 2018 में फैसला सुना चुकी है। जिसकी रोशनी में पदोन्नति में आरक्षण मामले का फैसला सुनाया जाना है, लेकिन तब से प्रकरण सुनने के लिए बेंच ही तय नहीं हो पा रही है।

दो बार इसके प्रयास हुए हैं, लेकिन दोनों बार बेंच से जस्टिस बदल गए। सपाक्स लगाएगी अर्जी सामान्य, पिछड़ा, अल्पसंख्यक वर्ग कर्मचारी संस्था (सपाक्स संस्था) के अध्यक्ष केएस तोमर कहते हैं कि उत्तराखंड को लेकर फैसला आ चुका है। जबकि हमारा मामला अटका पड़ा है। बेंच के गठन से लेकर सुनवाई शुरू होने में काफी समस्या आ रही है इसलिए लॉकडाउन खत्म होते ही संस्था सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगाकर जल्द और नियमित सुनवाई की मांग करेगी।

Posted By: Hemant Kumar Upadhyay

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