Madhya Pradesh News मोहम्मद अबरार खान, भोपाल। कहते हैं यदि रहवास में आग लग जाती है तो फिर पक्षी उस रहवास या आसपास के इलाके में वापस नहीं आते हैं। उन्हें वहां अपना आशियाना बर्बाद होने का खतरा हमेशा बना रहता है। ऐसा ही मध्य प्रदेश के गिद्धराज में हुआ। जैसा नाम, वैसा ही यहां ग‍िद्धोंका गढ़ था। दो साल पहले पीपल का एक पेड़ पूरी तरह जल गया। ग‍िद्धों के करीब दस घोंसले भी आग में जलकर खत्म हो गए। इस घटना के बाद से ही ग‍िद्धगढ़ में गिद्ध दिखना बंद हो गए।

अन्य चार पेड़ों पर भी ग‍िद्धों का बसेरा था, वे भी अब वीरान हो गए हैं। ग‍िद्धगढ़भोपाल से 30 किलोमीटर दूर रायसेन जिले के बालमपुर से लगा हुआ गांव है। सैकड़ों साल से यहां पीपल के पेड़ों पर बड़ी संख्या में ग‍िद्धों के आवास हुआ करते थे। साल दर साल गांव में आबादी के साथ खेती का रकबा बढ़ता गया और पीपल व अन्य प्रजाति के बड़े पेड़ कम होते चले गए।

वर्ष 2018 तक यहां पीपल के वर्षों पुराने विशालकाय पांच पेड़ बचे थे, जिन पर गिद्घों के आवास थे। सरकार ने संरक्षण के लिए ग‍िद्धगढ़ को पायलट प्रोजेक्ट में शामिल किया और यहां गिद्धों की निगरानी शुरू हुई। गांव के 75 वर्षीय बाला प्रसाद बताते हैं कि यहां पेड़ों पर हजारों गिद्ध रहते थे।

वर्ष 2019 में यहां हुई एक घटना के बाद गिद्धराज अब इस गांव से मुंह मोड़ चुके हैं। उस साल खेतों की नरवाई जलाने के कारण पीपल का एक पेड़ पूरी तरह जल जाने से सारे घोंसले जल गए थे। अब पिछले एक साल से गांव में बचे पीपल के चार पेड़ों पर एक भी गिद्ध द‍िखाई नहींं द‍िया।

अब वापस रहवास बनाना मुश्किल

प्रदेश के जाने-माने गिद्ध विशेषज्ञ दिलशेर खान बताते हैं, पशुओं को डाइक्लोफेनिक दवा देने और फसलों में कीटनाशक दवा के उपयोग से वर्ष 1990 के आसपास देश में गिद्ध की करीब 95 फीसद आबादी खत्म हो चुकी थी। तब से ही इनके मूल आवास क्षेत्रों में संरक्षण का कार्यक्रम शुरू हुआ। ग‍िद्धगढ़ के पीपल के पेड़ों पर उस दौरान भी व्हाइट लंब बैक वल्चर प्रजाति के गिद्ध बहुतायत में पाए जाते थे।

संभव है पेड़ के आग में जलने के कारण ग‍िद्धगढ़ से गिद्ध पलायन कर गए। यदि ऐसा है तो अब उनका यहां वापस रहवास बनाना मुश्किल होगा।

पहले भी हो चुकी हैं ऐसी घटनाएं

दिलशेर खान के अनुसार बीते साल फरवरी में ओरछा में एक आयोजन के कारण कुछ स्थानों से गिद्घों के घोंसले हटा दिए गए थे। अब पिछले एक साल में एक भी ग‍िद्ध वापस नहीं आया। इसी तरह सतना में रामनगर के ग‍िद्धकूट पहाड़ पर स्थित कई विशालकाय पेड़ करीब दस पहले तेज आंधी में धराशायी हो गए थे। वहां से भी ग‍िद्ध पलायन कर गए थे, जिनकी अब बमुश्किल बसाहट संभव हुई है।

किसानों को दिया जाना चाहिए मुआवजा

बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी (बीएनएचएस) के रोहन भी ग‍िद्ध गढ़ के ग‍िद्ध की निगरानी के काम में जुटे हैं। उन्होंने बताया जिन पेड़ों पर ग‍िद्ध रहते हैं, उसके नीचे की जमीन पर किसी प्रकार की खेती नहीं हो सकती। इसलिए सरकार को चाहिए कि ऐसे किसानों को कुछ मुआवजा राशि का प्रव‍िधान कि‍या जाए। ऐसी व्यवस्था गुजरात में है। तभी किसान ग‍िद्ध संरक्षण को महत्व देंगे।

Posted By: Hemant Kumar Upadhyay

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