भोपाल से राजीव सोनी। विकास की नई परिभाषा में प्रगति का एक रास्ता सड़क से होकर गुजरता है लेकिन मध्य प्रदेश में सड़कों पर ब्रेक लगाना मजबूरी है। अमेरिका की सड़कों से टक्कर लेने का दावा करने वाली टोल की सड़कों पर गड्ढों के रूप में बड़े-बड़े काले धब्बे उभर आए हैं। हालत यह है कि इन सड़कों की ऊपरी परत ही गायब बताई जा रही है। इन पर सरपट दौड़ने वाले वाहन भी हिचकोले खाने लगे हैं। सड़कों के निर्माण और मरम्मत के नाम पर हर साल आठ हजार करोड़ रुपए खर्च होने के बावजूद स्थिति निराशाजनक है। मध्य प्रदेश सरकार स्वयं मान रही है कि इस साल प्रदेश में अतिवृष्टि से कुल 5954 किमी सड़कों को भारी नुकसान पहुंचा है। 1015 पुल-पुलियाएं भी जर्जर हुई हैं। इनकी मरम्मत के लिए लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) ने सरकार से 1188 करोड़ रुपए का बजट मांगा है। जाहिर है आर्थिक संकट का सामना कर रहे प्रदेश में सड़कों की मरम्मत और निर्माण की 'राह" आसान नहीं है। डेढ़ दशक पहले मध्य प्रदेश की जर्जर सड़कों और बिजली जैसे चुनावी मुद्दों पर सवार होकर सत्ता की सीढ़ी चढ़ी भाजपा अब राज्य में सड़कों की मौजूदा बदहाली पर आश्चर्यजनक ढंग से मौन भी है।

इस बदहाली के कारण कुछ भी हों लेकिन इस बार विधानसभा में सशक्त विपक्षी दल होने बावजूद भाजपा भी सड़कों के मामले में सरकार को कठघरे में खड़ा नहीं कर रही है। महज डेढ़-दो साल पहले तक रफ्तार में रोड़ा: मप्र की सड़कों पर हर साल करीब आठ हजार करोड़ रुपए का खर्च, फिर भी गड्ढों से निजात नहीं राज्य में अमेरिका जैसी सड़कों का दावा करने वाले तत्कालीन मंत्री-मुख्यमंत्री भी सड़कों की एकाएक बदली सूरत पर कुछ नहीं बोल रहे। हालांकि इस सवाल पर प्रदेश के पीडब्ल्यूडी मंत्री सज्जन सिंह वर्मा मुस्कुराकर कहते हैं कि भाजपाई जानते हैं कि सड़कों पर कुछ बोलेंगे तो कठघरे में उनके लोग ही खड़े होंगे क्योंकि इस स्थिति के जिम्मेदार वही हैं।

शहरों की सड़कें भी कम परेशान नहीं कर रहीं : पीडब्ल्यूडी के ही एक आला अधिकारी ने हाल ही में मालवा-निमाड़ और महाकोशल अंचल का दौरा किया। नाम न छापने की शर्त पर उन्होंने बताया कि यह पहला मौका है कि टोल वाली सड़कों की हालत भी बहुत खराब है। ग्रामीण सड़कों की तुलना में बड़े शहरों की सड़कें ज्यादा परेशान कर रही हैं। स्टेट हाईवे जैसी स्थिति ज्यादातर राष्ट्रीय राजमार्गों की है, मेंटेनेंस न होने से ज्यादातर एनएच की सड़कें जर्जर हो चुकी हैं। प्रदेश के पीडब्ल्यूडी मंत्री सज्जन सिंह वर्मा कहते हैं कि केंद्र की ओर से राष्ट्रीय राजमार्ग के मेंटेनेंस का पैसा नहीं दिया जा रहा लेकिन इन सड़कों का कलंक भी हमारे ऊपर आता है।

टोल वसूलने वाली सड़कों पर भी हिचकोल

मध्य प्रदेश सरकार के सामने बदहाल सड़कें चुनौती बनी हुई हैं। प्रदेश के करीब पांच दर्जन मार्गों पर टोल टैक्स चुकाने के बावजूद वाहन गड्ढेदार सड़कों पर हिचकोले खाने को विवश हैं। दोहरा टैक्स चुकाने के बावजूद प्रदेश के नागरिकों को सरपट सड़कें नसीब नहीं हो रही हैं। मुख्यमंत्री कमल नाथ स्वयं विभागीय अधिकारियों को सड़कों की तकनीक सुधारने की नसीहत दे चुके हैं। उधर सड़क निर्माण से जुड़े विशेषज्ञों की मानें तो मप्र में अन्य राज्यों की तुलना में सड़क बनाने की तकनीक और इच्छा शक्ति दोनों की कमी है। केरल और मुंबई की सड़कें ज्यादा बारिश झेलने के बावजूद हमसे बेहतर क्यों बनी रहती हैं, इस सवाल का जवाब न तो प्रदेश के सड़क विकास निगम के पास है और न ही लोक निर्माण विभाग के पास।

गड्ढे के बड़े होने का इंतजार क्यों?

मध्य प्रदेश में सड़क निर्माण के बारे में बात करें तो तकनीक, स्पेसिफिकेशन, मॉनिटरिंग और पूरे सिस्टम में बहुत सुधार की जरूरत है। हमारे यहां सड़क पर यदि गड्ढा हुआ तो उसके बड़े होने का इंतजार होता है, तुरंत ही उसका इलाज नहीं किया जाता जबकि दिल्ली-मुंबई में मेंटेनेंस तुरंत होता है। यही कारण है कि वहां सड़कें ज्यादा खराब नहीं हो पातीं। यही बात मुख्यमंत्री कमल नाथ ने भी सड़कों की समीक्षा बैठक में कही है। - भीष्म कुमार चुघ, सेवानिवृत्त महानिदेशक, सीपीडब्ल्यूडी

बेहतर तकनीक पर हो रहा राय-मशविरा

इस साल प्रदेश में भारी बारिश के चलते करीब छह हजार किमी लंबी सड़कों को ज्यादा नुकसान हुआ है। सड़कों की मरम्मत के लिए 30 नवंबर की समयावधि दी गई है। बेहतर सड़क निर्माण तकनीक पर भी हम विशेषज्ञों के साथ राय-मशविरा कर रहे हैं। विभाग ने मरम्मत के लिए सरकार से 1188 करोड़ रुपए की राशि मांगी है। - आरके मेहरा, प्रमुख अभियंता, पीडब्ल्यूडी, मप्र

Posted By: Prashant Pandey