दिव्यता एवं समृद्धि प्राप्त करने के लिए होती है प्रकृति की आराधना

- मंग्का बैंड की प्रस्तुति के साथ जनजातीय साहित्य महोत्सव का समापन

भोपाल। नवदुनिया रिपोर्टर

मानव संग्रहालय में आयोजित तीन दिवसीय जनजातीय साहित्य महोत्सव के अंतिम दिन मंगलवार की शाम प्रख्यात बैंड मंग्का की प्रस्तुति हुई। पहली बार शहर आए बैंड ने प्रस्तुति के जरिए श्रोताओं-दर्शकों के मन पर अमिट छाप छोड़ी। इस अवसर पर मंग्का बैंड ने मणिपुर के मैतेई जनजाती के पारंपरिक लोक गीत मैकई ताइबा... सुनाया। मणिपुर में मैतेई जनजाती द्वारा दिव्यता एवं समृद्धि प्राप्त करने के लिए प्रकृति की आराधना करते हैं। चारों दिशाओं में विराजित पैतृक देवता पेना ईसइ एवं सुग से आशीर्वाद लेने के लिए मैकई ताइबा की प्रस्तुति दी जाती है। इस क्रम में काओ फबा मोइरांग महाकाव्य के विशाल गीत संग्रह में से एक पेना बैलेडर... सुनाया। इसमें मिथकों और किंवदंतियों की कहानियां का वर्णन हैं। इसमें खुमान प्रांत के पवित्र जंगली बैल 'नेंग्बा निंग्थी पामेइबा' के बारे में है, जो कि मोइरंग, खम्बा के प्रसिद्ध नायक ने भूमि की समृद्धि, राजा की दीर्घायु और अपनी प्रिय राजकुमारी थोबिबी के लिए गाया था। इसी प्रकार फुईसी प्रस्तुति दी। मणिपुर में चावल की कई किस्मों होती है। इस गीत में चावल के फसल को भूमि में बोने, उगने, काटने, साफ करने एवं उसे भोजन युक्त बनाने तक के प्रक्रिया समझाई। कार्यक्रम में आधुनिक लोकगीत खोंगजोम लान..यह गीत खोंगजूम पर्व जो 1891 में बहादुर मणिपुरी योद्धाओं और शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य के बीच भयंकर लड़ाई की कहानी बयां करता है। इस मौके पर हाराओ ईशी, लाई हरोबा आदि की प्रस्तुति दी।

वनपरी से राजा का वादा

इससे पूर्व उत्तराखंड के भोटिया जनजाती के बगड्वाल नत्य की प्रस्तुति दी गई। इसमें उत्तराखंड से आए भोटिया जनजातीय कलाकार,प्रेम सिंह हिंदवाल ने बताया कि यह नृत्य राजा जीत सिंह पर आधारित है। जीत सिंह राज्य के राजा होने के साथ एक अच्छे बांसुरी वादक भी थे। जीत सिंह वनपरी से वादा करते हैं कि नौ गते आषाढ़ के दिन हमारे गांव में रोपाई का दिन निश्चित हुआ है और उस दिन आना व मुझे हरण कर ले जाना। लेकिन जीत सिंह वनपरियों से छल कर अपने स्थान पर हल चलाने वाले मोलू नामक व्यक्ति को बैठा देता है। जीत सिंह की इस चालकी को देखकर वनपरी क्रोधित होकर जीत सिंह के पूरे परिवार को हर लेती है। लेकिन मरने के बाद जीत सिंह की आत्मा आसपास के सभी ग्रामवासियों को सताने लगती है। तब सभी ग्रामवासी उनकी आत्मा की संतुष्टी के लिए ढोल, दमाउ, भंकुर, भाणु, मसकबीन आदि वाद्ययंत्र के साथ जीत सिंह को अपना इष्टदेव मानकर बगड्वाल नृत्य करते हैं।

संकटों को समाप्त करता है गोंधल-जोगवा नृत्य

महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के लोक एवं जनजातीय नृत्य गोंधल एवं जोगवा की प्रस्तुति दी गई। महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र से आए श्रीकांत ने बताया कि गोंधल एवं जोगवा नृत्य पुराने आध्यात्मिक दोषों के कारण होने वाली पीड़ा के उपाय के रूप में और नकारात्मक ऊर्जाओं के कारण होने वाले संकटों को समाप्त करने के लिए किया जाता है। इसमें प्रारंभ में देवी को तेज आवाज के साथ जगाया जाता है। जोगवा नृत्य, देवी के पवित्र चरणों के लिए की गई प्रार्थना है, यह विनती आत्मा के अहंकार में कमी का प्रतीक है। जोगवा मग्ने एक सेवक के रूप में पूजा का एक रूप है। इस पूजा का असली रूप पांच घरों से भिक्षा मांगकर प्राप्त आटा, नमक, इत्यादि सामग्री की भिक्षा से पकाया जाने वाला भोजन है, जो देवी के सेवक के रूप में मिलता है। इस अवसर पर झारखंड का छाऊ नृत्य भी पेश किया गया।

Posted By: Nai Dunia News Network