भोपाल (नईदुनिया प्रतिनिधि)। सरकार के मॉडल एक्ट (अध्यादेश) पर सरकार और संयुक्त संघर्ष समिति मप्र मंडी बोर्ड भोपाल के बीच सहमति नहीं बन पाई है। इससे प्रदेश के करीब नौ हजार मंडी कर्मचारी- अधिकारी फिर से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जा सकते हैं। दरअसल, तीन से छह सितंबर तक हुई हड़ताल में सरकार और कर्मचारी संगठन के पदाधिकारियों के बीच तीन में से दो मांगों पर सहमति बनी थी, किंतु मॉडल एक्ट पर कोई निर्णय नहीं हो पाया था।

मोर्चे ने सरकार को 15 दिन में निर्णय लेने का समय दिया था। उक्त मांग पूरी न होने की स्थिति में मोर्चा अब फिर आंदोलन की रणनीति बना रहा है। मप्र शासन ने कृषि उपज मंडी अधिनियम 1972 में संशोधन कर मॉडल एक्ट लागू किया है। मंडी कर्मचारी इसका विरोध कर रहे हैं।

उनका कहना है कि यदि यह एक्ट लागू हो गया तो मंडियां बंद हो जाएंगी, क्योंकि व्यापारी मंडी के बाहर से ही किसानों की उपज खरीद लेंगे और मंडी समिति को मिलने वाला 1.7 प्रतिशत टैक्स नहीं मिल पाएगा।

इसके विरोध में लगातार चार दिन तक मंडियों में ताले लटके रहे थे। अब यदि फिर से मंडी कर्मचारी हड़ताल पर जाएंगे तो मंडियां लंबे समय तक बंद हो सकती हैं। इन दो मांगों पर हुई थी सहमति मोर्चा पदाधिकारियों के अनुसार मंडी बोर्ड एवं मंडी समितियों के अधिकारी-कर्मचारियों की सेवाओं को एक करने से वेतन-भत्ते को लेकर समस्या नहीं होगी।

वर्तमान में प्रदेश की लगभग 60 मंडियां ऐसी हैं, जहां के कर्मचारियों को हर माह वेतन के लाले पड़ते हैं। इसके अलावा 200 करोड़ रुपये आरक्षित निधि में रखे जाने की मांग पर सरकार से सहमति बनी है।

एक्ट का विरोध इसलिए

इसमें निजी क्षेत्रों में मंडियों की स्थापना का प्रविधान है, जबकि गोदामों आदि को भी निजी मंडी घोषित किया जा सकेगा। इससे मंडी समितियों का निजी मंडियों के कार्य में हस्तक्षेप नहीं होगा और टैक्स भी नहीं मिल पाएगा। मंडी समितियों के आर्थिक रूप से कमजोर होने की आशंका है।

मप्र : मंडियों पर एक नजर - 259 कृषि उपज मंडियां - 298 उप मंडियां - 9000 अधिकारी-कर्मचारी

इनका कहना है

मॉडल एक्ट में मंडी कर्मचारियों की भागीदारी होनी चाहिए। 15 दिन की समयावधि पूरी होने का इंतजार कर रहे हैं। यदि सरकार मांग नहीं मानती तो फिर से हड़ताल पर जाएंगे।

-बीबी फौजदार, प्रदेश संयोजक, संयुक्त संघर्ष मोर्चा, मंडी बोर्ड भोपाल

Posted By: Hemant Kumar Upadhyay

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